कटनी जंक्शन (मध्य प्रदेश) उतरा तो सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। ऊँघती हुई कटनी जग रही थी। आकाश में मेघ था। नीचे धरती भीगी थी। लगता था घंटे-दो घंटे पूर्व ही बारिश हुई थी। ट्रेन की एसी से ज़्यादा ठंड बाहर ही थी। मैं कभी कटनी आया नहीं था, न कभी सोचा था कि कटनी आऊँगा। लेकिन जो सोचते हैं, वह कभी होता नहीं और जो नहीं सोचते हैं, वह घटित हो जाता है। जीवन असीमित संभावनाओं के बीच साँसें लेता रहता है। हाँ, मुंबई जाते-आते ट्रेन की खिड़कियों से कटनी स्टेशन देखा था।
कटनी को मुड़वारा भी कहते हैं। मुड़वारा के बारे में तीन क़िस्से हैं, जिनमें से एक है अंग्रेज़ों और बाग़ियों से संबंधित। लोग सत्ता के ख़िलाफ़ बगावत न कर दें, इसके लिए अंग्रेज़ बाग़ियों के सिर काटकर टाँग देते थे। इसलिए इस स्थल का नाम मुड़वारा है। कटनी एक नदी है। नदियों की अपने क़िस्से -कहानियाँ होतीं ही हैं। कटनी नदी और कटनी किनारे बसे लोग। कटनी धीरे-धीरे वृहत्तर रूप लेती जा रही है। कटनी से बस लेकर उमरिया जाना था। स्टेशन से बस स्टैंड और बस स्टैंड से उमरिया ।
बस चली। शहर को छोड़ती बस। फिर जंगल शुरू। जंगल में सबसे पहले आकर्षित करते हैं- पलाश के बिहौतिया सिंदूर जैसे फूल। असंख्य। सड़क के दोनों ओर और दूर-दूर तक। सागौन (सागवान) के पेड़ भी। बीच-बीच में पता नहीं, क्यों और कैसे यूकेलिप्टस के पेड़ लगाए हुए हैं। आम, बबूल, बाँस, महुए के पेड़ बहुत हैं। पेड़ों से झरते पत्ते और नये-नये किसलय। गाँव बहुत कम हैं और आबादी बिहार की तरह घनी नहीं है। ज़मीन ज़्यादा है, इसलिए मकान छोटे-छोटे हैं। यहाँ तक कि दोमंज़िले मकान भी कम हैं। कहीं कोई अपार्टमेंट नहीं है। उमरिया दरअसल जिला है और इस इलाक़े को बान्धवगढ़ कहा जाता है, जहाँ बाघों का अभयारण्य है। सरकार ने तो अभयारण्य बनाया, लेकिन बाघ अभयारण्य की सीमाओं का उल्लंघन करता रहता है। वे आसपास के गाँवों में भी प्रवेश कर शिकार कर लेते हैं।
वैसे बाघ तो बेचारा बदनाम है। असल शिकार तो लोग कर रहे हैं। मनुष्य का मनुष्य द्वारा शिकार। दुनिया के बदतमीज़ जिन्हें सौंदर्य और शील नहीं चाहिए, वे सत्ता में पहुँच कर कुहराम मचाये हैं। समुद्र का पानी भी लाल हो रहा है और घर में भी ख़ून के छींटे हैं। डेढ़ सौ बच्चियों की हत्या क्या कम कलंक है इस पढ़ी लिखी दुनिया पर। अगर बच्चियों के लिए संवेदना नहीं है तो नेताओं के लिए क्यों हो? जो लोग असत्य भाषण करते हैं, झूठे वादे करते हैं, धूर्तता और बेईमानी ही जिनका जीवन-मूल्य है। जो प्रकृति को रौंद कर दुनिया बसा रहे हैं, उनसे बहुत प्यार करने का कोई मतलब नहीं है। इस धरती के पास बहुत कुछ है, लेकिन हम लोगों के लोभ ने उसे तबाह कर रखा है। हमें जीने के लिए नहीं, हड़पने के लिए ज़मीन और आसमान चाहिए। खैर, हमारी बस उमरिया बस स्टैंड पर रूकी। हमारे फ़ेसबुक मित्र अजय जी अपनी गाड़ी लेकर मौजूद थे। वहाँ से एक स्वप्निल दुनिया की ओर चल पड़े । अजय जी ने बाणभट्ट कुटीर बनाया है- ठीक उमरिया से बारह किलोमीटर दूर। कार चली और जंगलों के बीच से बढ़ती गई । अपूर्व दृश्य। झरते पत्ते, टपकते महुए। उसकी भीनी गंध। सिसकती हवा और असमय के मेघ। गर्मी कहीं नहीं थी, बल्कि ठंड हल्की कंपकंपी दे जाती थी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







