इन दिनों : मवालियों के पैने नख-दंत

"नफ़रत नयी दुनिया नहीं रच सकती। हिंसा सदा विध्वंस करती है। आज मनुष्य के अंदर जो व्याकुलता है, वह सामान्य व्याकुलता नहीं है। इस व्याकुलता ने मनुष्य के स्तर को बहुत नीचे गिरा दिया है, क्योंकि यह व्याकुलता में रचने की ख्वाहिश नहीं है। एक तरह से विध्वंस का आह्वान है।" - इसी आलेख से

सुबह उठता हूँ तो आकाश और पेड़ देखने की इच्छा होती है। चिड़िया की चहचहाहट सुनने की इच्छा होती है। इच्छा यह भी होती है कि ठंडी हवा आये और सहला जाए। यह देखकर मन आह्लादित होता है कि चिड़िया अब भी छतों पर बैठती है। कितना अच्छा लगता है कि दूर देश से आते पंछी दाना चुगने कहीं और जाते हैं और संध्या में पुनः हवाओं पर तैरते हुए वापस आते हैं। उनकी भी यादें होंगी और उनकी अपनी बौद्धिक क्षमता भी। इस विस्तृत दुनिया में उनकी उड़ान बड़ी है और उनकी बौद्धिक क्षमता पेचीदा नहीं है।

मनुष्य अपनी बुद्धि से ही परेशान है और शायद उसे अपनी बुद्धि पर भरोसा नहीं है, इसलिए उसने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आविष्कार किया है। मनुष्य पेंडुलम की तरह झूल रहा है। जन्म के साथ प्रकृति उसके सीने से लगी थी, लेकिन जब बुद्धि का व्यापार बढ़ा तो प्रकृति से कटता गया। बड़े-ऊँचे घर। मंजिल पर मंजिल। ऊँचाई बढ़ती गई और दिल-दिमाग़ में सिकुड़न की आहट सुनाई पड़ी।

जिन्हें प्रकृति से कटने का अहसास हुआ, वे बाज़ार में प्राकृतिक चीज़ें ढूँढने लगे। जिन डब्बों पर नेचर के दृश्य मात्र लगे होते हैं, ख़रीदार उसके प्रति आकर्षित होते हैं। लोगों को नेचुरल फूड चाहिए, लेकिन नेचर नहीं चाहिए। नेचर को मनुष्य ने इतना तंग-तबाह किया कि घरेलू गौरैया ग़ायब होने लगी है और कठोर-ह्रदय गिद्ध तो ग़ायब ही हो गया। मैंने अपनी छतों पर फुदकती सैकड़ों गौरैया को देखा है और मरी पर झपट्टा मारते सैकड़ों गिद्ध को भी। न जाने वे किस देश की ओर चले जा रहे हैं !

प्रकृति में हो रहे परिवर्तन की बड़ी वजह आदमी और उसकी आदतें हैं। उसकी भूख अभूतपूर्व है। यह भी ले लो, वह भी ले लो। सब हड़प लो। पेट भरता नहीं है। चिड़िया का पेट भरता है, मनुष्य का नहीं। जो डालो, वह खाता जायेगा। बाद में चाहे ओछर-बोकर दे। दुनिया को सँवारने का दावा अगर मनुष्य करता है तो दुनिया को जहन्नुम बनाने के अपराधी भी वही हैं।

मनुष्य विचित्र जीव है। वह जब अपने कर्मों के कारण अशांत होता है तो शांति को ढूँढने चल देता है। जब बहुत पाप कर लेता है तो अध्यात्मिक बनना चाहता है। असंतोष को संतोष की तलाश है। महाभारत हुआ। ख़ून की नदियाँ बहीं। नैतिकता-अनैतिकता का कोई मतलब नहीं रहा। लड़ाई के बाद जो लोग बचे, उन्हें गद्दी मिली तो मनुष्य की चीत्कार भी उसके हिस्से आयी। आज जो लोग ख़ूनी लड़ाई का आह्वान कर रहे हैं, कल उनके पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं रहेगा।

नफ़रत नयी दुनिया नहीं रच सकती। हिंसा सदा विध्वंस करती है। आज मनुष्य के अंदर जो व्याकुलता है, वह सामान्य व्याकुलता नहीं है। इस व्याकुलता ने मनुष्य के स्तर को बहुत नीचे गिरा दिया है, क्योंकि यह व्याकुलता में रचने की ख्वाहिश नहीं है। एक तरह से विध्वंस का आह्वान है। गांधी अंतिम दौर में बहुत व्याकुल थे। क्या करें, क्या न करें? नफ़रत और हिंसा की आग में झुलसते मनुष्य को बचाने के लिए कहाँ-कहाँ जायें? कलकत्ता या पंजाब या बिहार? आज़ादी का झंडा फहराया जा रहा था और वे कलकत्ता में भाईचारे के लिए व्याकुल थे। आज मनुष्य गद्दी के लिए व्याकुल है। कितने ड्रामे और कितने जघन्य काम! आज़ादी के लिए शहादत इसीलिए दी गई थी कि गुंडे-मवाली राजपाट चलायें, इंसानों की थरथरी छूटे और बेईमान नंगा नाच करे।

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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