आज भगत सिंह की शहादत का दिन है तो डॉ राममनोहर लोहिया का जन्म दिन भी है। दोनों विचारों से लबरेज़ थे। दोनों को याद करते हुए आज विचारों की प्रकृति पर विचार करें। सात समुद्र पार करने पर जातिच्युत करने की जहाँ परंपरा हो, वहाँ के विचार छलाँग लगाते चीन, वर्मा, श्रीलंका आदि कई देशों में फैल गये। बुद्ध का जन्म लुम्बिनी में हुआ, ज्ञान बोधगया में प्राप्त हुआ और उनके विचार को दुनिया के कई देशों ने अपनाया। सरहदें आप बनाइए, लेकिन हवा, पानी, पंछी और विचार सरहदें नहीं मानते। यहाँ तक कि जानवर मनुष्य की बनाई सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। आप लाठी-पैना लेकर विचारों की पहरेदारी कीजिए, लेकिन जैसे पानी तल ढूँढ लेता है, वैसे ही विचार अपने तल ढूँढ लेता है। आप ज़बर्दस्ती न विचार फैला सकते हैं और न उसे बाँध सकते हैं।
सातवीं शताब्दी में उज्जैन निवासी थे ब्रह्मगुप्त। उन्होंने शून्य का आविष्कार किया था। यह शून्य ने कमाल किया। गणित के ज्ञान में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया। आठवीं सदी में बग़दाद से आये अल-ख्वारिज्मी। वे उज्जैन से ब्रह्मगुप्त का सिद्धान्त लेकर गये। उन्होंने उसका तर्जुमा किया। उसमें जोड़ा और अलजेबरा के जनक बने। इसका लातिन में अनुवाद हुआ- दे ‘न्यूमरो इण्डोरम’ के नाम से। बारहवीं-तेरहवीं सदी में यूरोप में प्रचलित हुआ। आज अलगोरिथ्म की जो धूम मची है, वह अल-ख्वारिज्म के नाम पर है।
विचारों की आवाजाही के अजीबोग़रीब क़िस्से हैं। हम इक्कीसवीं सदी में रहते हैं। ज्ञान के विस्फोट का युग है। मगर दुर्भाग्य है कि हम बम का विस्फोट कर रहे हैं। ईसा पूर्व के बुद्ध आज भी अनेक देशों में मौजूद हैं। सातवीं सदी के ब्रह्मगुप्त और अल-ख्वारिज्मी ने गणित की इतनी बड़ी दुनिया रच डाली और हम हैं कि ग्रेटर इज़रायल, ग्रेटर नेपाल , ग्रेटर भारत, ग्रेटर रूस और ग्रेटर अमेरिका कर रहे हैं। ये लोग या तो अंधे हैं या ज्ञानशून्य हैं। ज्ञान के बहाव को नहीं देखते। इंटरनेट की दुनिया कहाँ सीमाएँ मानती हैं !
जहाँ रचना है, वहाँ सीमाहीनता है। जहाँ कट्टरता है, वहाँ सीमाएँ-ही-सीमाएँ हैं। लेकिन हर व्यक्ति और समाज को अपनी जड़ों से जुड़ा होना चाहिए। विचार आये। वह भ्रमण करे, लेकिन आपके पास मूल्यांकन-क्षमता होनी चाहिए। हम क्या अपनाएँगें और क्या छोड़ेंगे, यह विश्लेषण-क्षमता बेहद ज़रूरी है। हमें विचारों के माध्यम से मुक्ति चाहिए, ग़ुलामी नहीं।
पश्चिम जगत का अश्वमेध सबकुछ लील लेना चाहता है। वह अपने पैमाने पर पूरी दुनिया को तौल रहा है। वह चाहता है कि पूरी दुनिया उसके रंग में रंग जाए। यह एक ख़तरनाक विचार है। अभी का दौड़ता वैचारिक घोड़ा शोषण का उद्घोष है। वह रचने नहीं, लूटने आया है। आधुनिकता में रंगा, लुभाता और तरह-तरह के रूप धरता हमें अपनी धरती, हवा और प्रकृति से बेदख़ल करने आया है। इसकी भाषा है – वेनेजुएला मेरा है, ईरान मेरा है, दुनिया की सभी संपदा मेरी है। इसकी ऐसी भूख है, जो कभी मिटती नहीं। इनके पंजे ख़ून से रंगे हैं। जो इनके साथी हैं। वे उनके ज़रख़रीद ग़ुलाम हैं। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं? और जानते भी हैं तो इतना कि वे रिंग मास्टर के सामने थरथरा कर लाइन में खड़े रहें।
बुद्ध या ब्रह्मगुप्त या अल-ख्वारिज्मी ने संसार को समृद्ध किया, आज के लोग अपनी धौंस और धमक से दुनिया को नष्ट करने पर तुले हैं। विचार रचते हैं और जो नहीं रच पाते, वे विचार नहीं हैं। उससे मुनाफा कमाया जा सकता है, लेकिन दुनिया रची नहीं जा सकती।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






