ट्रंप बच गए। वे राष्ट्रपति हैं। सुरक्षा कड़ी रहती है। उन पर गोलियाँ चलाने वाला एक इंजीनियर है। नाम है एलन। उसकी माँ श्वेत है और पिता अश्वेत। ट्रंप के बारे में उसकी राय है कि वे रेपिस्ट और गद्दार हैं। दुनिया बॉयलिंग पॉइंट पर है। हर देश खौल रहा है। खौलती ही दुनिया में कुछ लोग यह चाहते हैं कि उनके आसपास लोग बेचैन रहे और वह एक द्वीप बनाकर उस पर चैन की वंशी बजायें। यह चैन क़तई क़ायम नहीं रहेगी।
सुबह-सुबह रोज़ अख़बार देखता हूँ। आधा अख़बार किसी की हत्या या बलात्कार से रंगा रहता है। मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार और उसकी हत्या। हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं। ठग और लुटेरे संसद में घुस कर महिला सुरक्षा के लिए बिल लाते हैं। यह जानते हुए कि यह बिल गिर जायेगी। फिर वे देश में हल्ला मचायेंगे कि मैं हूँ महिलाओं का चैंपियन। जबकि उनकी पार्टी में हत्यारे भी हैं और बलात्कारी भी। अंधी राजनीति का यह आलम है कि इने-गिने दलों को छोड़कर कोई दल नहीं है, जिसमें हत्यारोपी और बलात्कारी न हों। ट्रंप पर चली गोलियाँ कोई अच्छा संकेत नहीं है, लेकिन ट्रंप हर दिन ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें वे लोगों के अंदर उत्तेजना भरते हैं। अपने स्वार्थ के लिए जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण करते हैं और ईरानी के बच्चे-बच्चियों की हत्या कर शर्म नहीं महसूसते तो आप दुनिया में हिंसक वातावरण पैदा करने के दोषी हैं।
भारत में धार्मिकों की बाढ़ आ गई है। मंदिरों की स्थापना की रफ़्तार सेटेलाइट की रफ़्तार की तरह है। कदम-कदम पर भगवान उग आए हैं। नेता स्कूल या कॉलेज का दौरा नहीं करते, वे चंदन-टीका लगाकर मंदिर पहुँच जाते हैं। बिहार के नये-नवेले मुख्यमंत्री मंदिर पहुँच कर धन्य हुए और उन्होंने मंदिर चमकाने का भी वादा किया। काश, मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही पटना विश्वविद्यालय पहुँच जाते। लेकिन पटना विश्वविद्यालय वोट नहीं दिलाता। मंदिरों में वोट है। उँगलियों में पत्थर ऐसे पहनते हैं कि लगता है कि जनता उसे नहीं जिताती, बल्कि पत्थर ही उसे जीता रहा है।
मैंने इधर गांधी पर प्रवचन देते हुए दो लोगों को देखा। वे भी पत्थर धारण किए हुए थे। जब खुद पर भरोसा नहीं है तो गांधी पर क्या भरोसा करेंगे? वे यह भी नहीं समझते कि पत्थर लगाइए या चंदन टीका- काल-चबेना बनना ही है। भारत में धर्म महज़ किताबों में नहीं है। हर कोने-कंतरे में वह मौजूद है। उस पर आजकल तो धर्म का ही बल्ले-बल्ले।
जिन युवाओं को सिर पर कफ़न बाँध कर अन्याय के खिलाफ लड़ना था, वे आजकल सिर पर चंदन लपेस रहे हैं। धर्म इस कदर फैला हुआ है। कण-कण में भगवान हैं, तब देश में इतनी हत्यायें और बलात्कार! आख़िर कहाँ छुपे हैं? कब निकलेंगे और बलात्कारियों और हत्यारे को सजा देंगे? भारतवासियों का दुर्भाग्य है कि जो नहीं है, उस पर भरोसा है और जो है, उसे पीड़ित और प्रताड़ित करता है। कपड़े धर्म के और मन में स्वार्थ, घृणा और हिंसा। कबीर ने ठीक ही कहा था- ‘मन ना रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।/ आसन मारि मंदिर में बैठै / ब्रह्म-छाँड़ि पूजन लागे पथरा।’
जो भी हो। दुनिया का नेतृत्व जिसके हाथों में हैं, उससे कोई उम्मीद नहीं बँधती। आगे हिंसा ज़्यादा बढ़ेगी। जब सार्वजनिक मंचों से हिंसा का आह्वान पदधारी कर रहे हैं तो गली-कूचों की बात तो छोड़ दीजिए। सत्ता संगठित रूप से लोगों को हिंसा की ट्रेनिंग दे रही है और बलात्कारियों को अपने दल में पाल-पोस कर संकेत दे रही है कि बलात्कार करना कोई गुनाह नहीं है ।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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