पेड़ों से पत्ते भी झड़ रहे हैं और मंज़र भी। बगीचे में पाँव तले सूखे पत्ते मच-मच करते हैं। कोयल लगातार कूकती है- कू..कू…कूह। कचबचिया के अलग स्वर हैं। एक अनजाना पंछी पेड़ फुल्लगियों पर नाचते- कूदते स्वर देता है- रिंऽ..रिंऽ…रिंऽ…..। मटर के दाने की तरह अमौरियॉं हैं। किसी पेड़ में लदके फल लगे हैं तो किसी के मंजर जल गए हैं ।
प्रकृति नवरचना और ध्वंस का ही नाम है। नवरचना में तो सौंदर्य है ही, ध्वंस का भी एक सौंदर्य होता है। धूप से जले हुए मंजर धरती पर बिखरे पड़े हैं। कुछ दिन पूर्व पेड़ों के लाड़ले थे, अब उपेक्षित हैं। उपेक्षा टीस मारती है। जीवन को दग्ध करती है, लेकिन सीख भी देती है।
उपेक्षा के कारण ही करोड़ों बच्चे सूखे नशे के शिकार हो रहे हैं। नशे के लिए वे क्या-क्या नहीं कर रहे? जीवन रोग बनता जा रहा है। हम समृद्धि की तलाश में हैं। पुकार-पुकार कर कह रहे हैं- समृद्धि आ चुकी है। मैं ख़बरें पढ़ता हूँ- समृद्धि चकनाचूर हो जाती है। कौन सी निर्घिन घटनाएँ नहीं घट रहीं?
कानों में आकाश बजता है। समुद्र चीत्कार करता है। नदियों में मरोड़ है। जीवन को कहीं पहुँचना था, पहुँच कहीं गया है । जीवन में स्वीकारोक्ति है- असत्य का। असत्य से सत्य की ओर नहीं, सत्य से असत्य की ओर। आँसू तो आकाश के भी बहते हैं। मानुष-सत्य का उद्घोष होता है। प्रेम मानुष-सत्य है। कबीर क़हते हैं- ‘प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।/ राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय।’ प्रेम न बाड़ी में उगता है, न प्रेम हाट में बिकता है। सीस देकर यानी अहंकार से मुक्त होकर प्रेम मिल सकता है। अहंकार भयानक बीमारी है। इससे मुक्ति बहुत मुश्किल है। हर मौके पर अहंकार खड़ा हो जाता है। अजब- ग़ज़ब कहानी है जीवन की।
लगता है फ़िलहाल अहंकार का एक क्रूर खेल है- राजनीति। पारिवारिक जीवन अहंकार से दग्ध है। कोई अपने को भूलना नहीं चाहता। फण काढ़ा मनुष्य डंस ही सकता है। लेकिन मनुष्य में अपार संभावनाएँ हैं । दुनिया में अपार संभावनाओं की अभिव्यक्ति भी होती रही है। गौतम बुद्ध जब अपने का भूल गये और कायनात से अभिन्न हो गये तो सर्वोत्तम संदेश आया- ‘इच्छा ही दुख का कारण है।’ इच्छा मुक्ति शायद अहंकार मुक्ति ही है।
आसपास बहुत बजबजाहट है। दूर से भी जो स्वर आता है, वह भी। राजनीति किधोर हो गई है। राजनीतिक-जल में मनुष्य छटपटा रहा है। उसे फ़्रेश वाटर चाहिए। मनुष्य को फ़्रेश वाटर संस्कृति दे सकती है। संस्कृति मुक्ति का माध्यम बन सकती है। राजनीति से लोभियों, मुफ़्तख़ोरों, लफ़ंगों, लुटेरों से मुक्ति के लिए सुदृढ़ सांस्कृतिक कर्म की ज़रूरत है। गोपालदास नीरज ने लिखा-
“अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए। जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।”
दुनिया के सभी मानव को कुटुंब मानने का दावा करने वाले के लिए पड़ोसी का घर भी कुटुंब नहीं है। यह सदियों से है। इसके लिए न शर्म, न अफ़सोस। ऊपर से गर्व। सबकुछ छिन्न-भिन्न होता रहा। हम सिद्धांत गढ़ते रहे और व्यवहार क्रमशः निम्न होता गया। ढोंग और ढकोसला। हम नदियों में विष्टा बहाते रहे, मुर्दे जलाते रहे, नदियों को गंदगी से पाट दिया और किसी ने रोजा खोल दिया। कुहराम मच गया। धर्म संकटग्रस्त हो गया। चीखें निकल गईं। आँखें तन गई।
कितने नीचे आयेंगे तो सँभलेंगे!

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







