इन दिनों : निर्वसन मैदान में लेटी हुई है एक नदी

"परसों रात को लगभग दो बजे नींद उचट गई तो मैंने बल्ब जलाया और स्वामी विवेकानंद की पुस्तक लेकर पढ़ने लगा। जब भी मन में बहुत ज़्यादा उद्वेलन होता है तो विवेकानंद सुकून देते हैं।" - इसी आलेख से

अंधियाला दिन। उत्तर की दिशा में लगता है, आकाश में धूल ही धूल है। यों हवा पूरब से बह रही है। आतप-ताप पूरी तरह से उतर चुका है। यहाँ तक कि रात में पंखे भी नहीं चलते। आठ-नौ दिनों से मौसम में भारी उलटफेर है। मन में भी है। रात में उलटे-सीधे सपने आते रहे। मैट्रिक तक भूत के सपने बहुत आते थे। अब भूत ग़ायब है। कहा जाता है कि दमित इच्छाएँ सपने बन कर आती हैं। लेकिन मुझे पूरा सच नहीं लगता। सभी सपने दमित इच्छाओं के परिणाम नहीं हैं। बावजूद इसके यह प्रश्न तो अनुत्तरित है कि ये सपने आकार कैसे लेते हैं?

परसों रात को लगभग दो बजे नींद उचट गई तो मैंने बल्ब जलाया और स्वामी विवेकानंद की पुस्तक लेकर पढ़ने लगा। जब भी मन में बहुत ज़्यादा उद्वेलन होता है तो विवेकानंद सुकून देते हैं। पढ़ते-पढ़ते मन में आया कि उनकी तस्वीर घर की दीवारों पर लगानी चाहिए। मैं जहाँ भी रहा, चाहे रेंट वाला घर हो या अपना घर- किसी की दीवार पर कोई तस्वीर नहीं लगायी। दीवारों पर न कोई महापुरुष हैं, न महान महिला। एक बार इच्छा हुई कि माँ-पिता की तस्वीर लगाई जाय। स्टूडियो वाले से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि मोबाइल से लिया गया फोटो है, अच्छी तस्वीर नहीं आयेगी। मन का उत्साह दरक गया और यह योजना स्थगित हो गई। उस रात जब विवेकानंद की तस्वीर लगाने की इच्छा हुई तो मेरे अंदर एक सवाल उठा कि और कौन से महापुरुष हैं, जिसकी तस्वीर लगाई जा सकती है? दिमाग़ में पहला नाम बुद्ध का आया। फिर ईसा का, इसके बाद गांधी का और तब विवेकानंद का। पाँचवाँ नाम मदर टेरेसा का आया और छठा डॉ लोहिया का। सातवाँ रवींद्रनाथ ठाकुर का।

मैंने हिंदी साहित्य ही पढ़ा है और पढ़ाया है । हिंदी साहित्यकारों में कबीर याद आये। फिर प्रेमचंद, हजारीप्रसाद द्विवेदी और अज्ञेय। इसके अलावे भी बहुत से नाम हैं, लेकिन तस्वीरें लगाने की इच्छा नहीं हुई। ऐसा भी नहीं है कि इन्हें मैंने बहुत पढ़ा है और उनके ही बताए रास्ते पर चलता हूँ, बावजूद इसके उसकी सौम्यता मुझे अच्छी लगती है। उनके लेखन, विचार और कर्म-सौंदर्य भी इसके कारण रहे ही होंगे।

मैं पढ़ता ही रहता हूँ, लेकिन पढ़ी हुई बहुत सी चीज़ें याद नहीं रहती। स्मृति बहुत मज़बूत नहीं है। उनमें दरारें बहुत हैं और उन दरारों में से पढ़ी हुई चीज़ें निकल जाती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद सोचा था कि खूब पढ़ूँगा, खूब लिखूँगा और खूब यात्रा करूँगा। इस प्रसंग में ‘ख़ूब’ शब्द हटा देने के बाद वस्तुनिष्ठता आ जाती है। तीनों काम करता हूँ, मगर रफ़्तार नहीं है। मैट्रिक से पूर्व मुझे किताबें डराती थीं। मुझे लगता था कि कौन बेवक़ूफ़ है, जिसने इतनी किताबें लिख दी हैं, जिसे पढ़ना पड़ रहा है। न पढ़ो तो मास्टर और पिता – दोनों लाठी लिए खड़े रहते हैं।

जब कॉलेज आया तो किताबों से अविस्मरणीय प्रेम हुआ। पेट काट कर भी किताबें ख़रीदीं। आज भी किताबें ख़रीदता ही रहता हूँ। नई किताबें देखकर मन ललक जाता है। दुनिया में किताबें नहीं होतीं तो मुझे तो दुनिया बेहद नीरस लगतीं। आजकल ई बुक्स का चलन है, लेकिन मुझे एकदम नहीं भाता। शायद दिमाग़ पुराना है। नये को स्वीकार नहीं कर पा रहा। किताबों के अलावे मुझे प्रकृति बहुत अच्छी लगती है। आकाश, चाँद, सागर, नदियाँ, पर्वत, जंगल, पेड़ , फूल, नवजात पत्ते, पक्षी। रिश्तों की सुगंध और अपनी अच्छाइयाँ और अपनी भूलें।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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2 Comments

  1. Thatt is a rally god ttip especcially tto those fresh too thhe blogosphere.
    Short but veryy precise info… Thanks ffor sharing thos one.

    A mist read post! ofvd9wuaptgeoasma38p

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