इन दिनों : कृतज्ञता और कृतघ्नता

"गृहस्थ को तो घर चलाना है। उसकी चिंता समझ में आती है, लेकिन संत क्यों चिंतित है? दरअसल संत आज ज़्यादा चिंतित है, क्योंकि संतई छोड़ कर संतई का धंधा कर रहा है और धंधा तो महान चिंता का कारण है।" - इसी आलेख से

आज बादल कुछ ज़्यादा ही है। पानी बरस नहीं रहा है, लेकिन आकाश कभी भी टपक सकता है। हवा ठंड से भरी है। आज का दिन भी और दिनों की तरह है। गली में कुत्ते हैं, छतों पर बंदर हैं और चिड़िया की चुनमुन है। सड़कों पर बड़ी-बड़ी ट्रकें हैं। ट्रकों से बचती-बचाती कारें और ऑटो। उन पर बच्चे लदे हैं। वे स्कूल जा रहे हैं। सब कुछ नियमित है।

प्रकृति हरेक जीवों-जानवरों को जीने का ढंग सिखा देती है। ज़्यादातर जीव-जानवर माता-पिता से जल्द ही अलग हो जाते हैं और स्वतंत्रतापूर्वक जीते हैं। उनकी आवश्यकताएँ भी कम हैं और उन्हें जमा करने की होड़ नहीं है। वे वर्तमान में जीते हैं। कल की चिंता न के बराबर है। आदमी कल की चिंता में ही घुटा हुआ रहता है। वर्तमान में कम ही जीता है। वह या तो आगे जीता है या भी बहुत पीछे अतीत में। वह चिंता से शुरू होता है और चिंता में ही दम तोड़ता है।

कामायनी’ का पहला सर्ग का नाम ही ‘चिंता’ है। मनु का सर्वस्व लुट गया है। नगर, गृह, सगे -संबंधी। वह भीगे नयनों से जल-प्रवाह देख रहा है। वह क्या करे, क्या न करे! वह चिंतित है। जयशंकर प्रसाद चिंता को शब्द देते हैं- “ओ चिंता की पहली रेखा,/अरी विश्व-वन की व्याली;/ ज्वालामुखी स्फोट के भीषण,/प्रथम कंप-सी मतवाली!” मनुष्य चिंता-भार से बोझिल हो जाता है। उसकी सहजता- सरलता खो जाती है।

आज चिंता ने विस्तार पा लिया है। गृहस्थ तो गृहस्थ, तथाकथित संत भी चिंतित हैं। गृहस्थ को तो घर चलाना है। उसकी चिंता समझ में आती है, लेकिन संत क्यों चिंतित है? दरअसल संत आज ज़्यादा चिंतित है, क्योंकि संतई छोड़ कर संतई का धंधा कर रहा है और धंधा तो महान चिंता का कारण है।

आज धंधे का युग है। आपका धंधा जिससे चमक जाए। संसार में उलटबाँसी भी कम नहीं है। भगवान महावीर जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर थे। जैन धर्म त्याग के लिए जाना जाता है। चाहे दिगंबर हो या श्वेतांबर। जैन धर्म की प्रमुख विशेषताओं में एक विशेषता है – अपरिग्रह। अपरिग्रह का मतलब होता है कि बहुत वस्तुओं को जमा नहीं करना और न लोभ-लालच करना। जैन धर्म को मानने वाले ज़्यादातर लोग व्यापारी हैं, जो न केवल लोभ-लालच करते हैं, बल्कि अकूत संपत्ति जमा करते हैं। क्या व्यापारी अपने तीव्र परिग्रह की वजह से अपरिग्रह की पूजा करते हैं?

आजकल रामकथा वाचक बहुत निकल आए हैं। अगर आपका गला अच्छा है और राम कथा जानते हैं तो मजे में अपना व्यापार जमा ले सकते हैं। इन लोगों ने अपने को सत्ता और मीडिया से जोड़ रखा है। ये बड़े-बड़े बयान देते हैं। वे टेलीविज़न पर बैठ कर कहते हैं कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता नहीं हैं और नथूराम गोडसे देशभक्त था। हत्यारे का महिमामंडन ये संत करते हैं और जो सचमुच साधु की तरह जीवन जीया, उसे अपशब्द कहते हैं।

मौजूदा वक़्त में विचार का नहीं वैचारिक फैशन की महत्ता है। आपके पास सत्ता है। आप कुछ भी कह दे सकते हैं। दरअसल ये लोग कृतघ्न लोग हैं। फ़र्ज़ी संतों के अलावे भी बहुत से लोग दिखाई पड़ते हैं, जो अतिरिक्त उत्साह में आकर महात्मा गांधी पर बरस पड़ते हैं। इन्हें इतिहास की सच्चाई से कोई मतलब नहीं है। कोई आदमी किसी महान पुरुष को याद करे और उसके नक़्शेक़दम पर चले तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, लेकिन दूसरे महान पुरुषों पर ढेला फेंकते रहने का कोई मतलब नहीं है। जिसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, उसके प्रति नफ़रत पैदा करना तो कृतघ्नता है।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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