कटनी से चलकर जब सुबह-सुबह पटना जंक्शन आया तो घड़ी की सूई चार पर टिकी थी। सैकड़ों लोग प्लेटफार्म पर सोये थे और सिपाही सीटी बजा रहे थे। सीटी बजाने का मतलब था – ‘ हे भारत के पब्लिक, नींद खोलिए। अब सोने का वक़्त नहीं है।’ जो पब्लिक सीटी पहचानती थी, वह तो अंगराई लेती हुई जग गयी और जो सीटी का अर्थ नहीं जान सकी, उसके लिए सिपाही अपनी सुमुधर बोली का इस्तेमाल किया और डंडे फटकारने लगी।
पब्लिक और सिपाही नदी के दो किनारे हैं। दोनों मिल नहीं सकते। कम से कम एकाध मौक़े को छोड़ कर सिपाही को अच्छी भाषा में बात करते हुए नहीं सुना। क्या पब्लिक के सेवक को ऐसी ही ट्रेनिंग दी जाती है? लोकतंत्र के सिपाही और औपनिवेशिक तंत्र के सिपाही के स्वभाव, बातचीत और लहजे में अंतर तो होना चाहिए। यह हमने सिखाया नहीं और न ज़रूरत महसूस हुई।
आज़ादी के बाद नौकरशाही पर व्यापक विमर्श होना चाहिए था। सच्चाई यह है कि भारत का शासन अघोषित रूप से नौकरशाही ही चलाती है। नेता आते-जाते रहते हैं। नौकरशाही अविचल रहती है। वह नेताओं के पसंद-नापसंद के आधार पर पदों पर ऊपर-नीचे होती रहती है। नौकरशाही पूरी तरह ख़त्म हो जायेगी, इसकी संभावना नहीं है, लेकिन इसकी ताक़त का सीमांकन और उसके स्वभाव में बदलाव तो किए ही जा सकते हैं। दरअसल उसके पास अकूत ताक़त है और सत्ता की पूरी निर्भरता उस पर बनी रहती है। आज भी उनके चयन और प्रशिक्षण के तरीक़े औपनिवेशिक तंत्र के तहत ही होता है। इसलिए उनका मन-मिज़ाज औपनिवेशिकता वाला बना हुआ है।
संविधान बनाने वालों ने वयस्क मताधिकार दिया, लेकिन जिसे मत दिया, उसने तंत्र के स्वभाव और प्रकृति बदलने की जरा भी कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे ऐसी नौकरशाही पसंद थी। नौकरशाही की भी अजीब दास्ताँ है। वह अपने से ऊपर का चरण-चुंबन करती है और अपने से नीचे को गालियाँ देती है। उसकी भी वैसी ही कैटेगरी बनी हुई है, जैसे जातियों की बनी है। दोनों में सह्रदयता की बहुत कमी है।
स्टेशन के कुछ स्थायी निवासी हैं। हर रोज़ हज़ारों लोग आते हैं, जाते हैं। वे हाथ पसारे, प्लास्टिक की बोतलें चुनते मिल जाते हैं। गंदे कपड़ों में लिपटे इन लोगों का जब कोई घर नहीं है, तब इनका देश कैसे होगा? ये घर-दरवाज़े से त्यागे हुए लोग हैं। वैसे तो बहुतों को नहीं पता कि वे क्यों जी रहे हैं, फिर इन्हें कैसे पता होगा? साँसें चल रही हैं, इसलिए जी रहे हैं। कल्याणकारी राज्य में उसके कल्याण के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। निराला ने ‘भिक्षुक’ कविता लिखी ग़ुलाम भारत में लिखी थी। आज़ाद भारत में भी उसकी दशा सुधरी नहीं-
“वह आता-- दो टूक कलेजे को करता, पछताता पथ पर आता। पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता — दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।”
न नौकरशाही, न नेता भिक्षुक को मुक्त कर सके। उल्टे भिक्षुक-मन का विस्तार हो गया है । जिसके पास है, वह भी लाइन में खड़ा है। हरेक को चाहिए, सिर्फ़ चाहिए। न मिटनेवाली भूख से भारत त्रस्त है। नेता हुआ तो लूट लो। आई ए एस हुआ, शादी से ही लूट शुरू। बाज़ार में क़ीमत लग गई और उसके बाद वह पूरा जीवन क़ीमत के ही शिकार हैं। जो प्लेटफ़ॉर्म पर हाथ पसारे खड़े हैं, उन्हें भी जीवन जीने के सलीके का नहीं पता और जो आई ए एस हैं, उन्हें भी नहीं पता।
बेतरतीब-से सिस्टम में बेतरतीब जीवन ही पल सकता है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






