यह तो चुनाव नहीं था। जीत-हार तो किसी की भी हो सकती है। लोकतंत्र है, राजतंत्र तो है नहीं। लेकिन लोकतंत्र में यह निश्चित होना चाहिए कि मतदाता सूची में हरेक नागरिक का नाम हो। चुनाव आयोग का यह पहला दायित्व है। मतदाता सूची में सभी नागरिकों का नाम न होना और चुनाव घोषणा कर चुनाव करवाना- कहीं से भी लोकतंत्र के दृष्टिकोण से सही नहीं है। अगर यह सही है और हम एक नागरिक के बतौर समर्थन करते हैं, तो यह मानिए कि बचे-खुचे लोकतंत्र की हत्या के लिए हम सब दोषी हैं।
एसआईआर इसलिए किया जाए कि सत्ता चुनाव आयोग से मिल कर अपने लायक़ मतदाता सूची बनाये, यह कहीं से भी मान्य नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट उन मतदाताओं से, जिनके नाम मतदाता सूची में नहीं है, यह कहे कि अगले चुनाव में मत दे देना, यह डॉ भीमराव अम्बेडकर के द्वारा बनाये गए संविधान का न केवल अपमान है, बल्कि उसके बुनियाद पर सीधा-सीधा प्रहार है। हो सकता है कि आज आप सब इससे असहमत हों और सत्ता, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के अपराधों पर चुप रहें, लेकिन इसके दुष्परिणाम देश को भोगना है। यह लोकतंत्र की छाती पर अंतिम कील ठोकने जैसा है।
चुनाव में जाति और धर्म के आधार पर वोट नहीं माँगा जा सकता। प्रधानमंत्री सहित छोटे-बड़े नेता खुलेआम धर्म के नाम पर वोट माँग रहे हैं। लज्जा की बात यह है कि संवैधानिक दायित्व के पदों पर बैठा आदमी वोट के लिए कभी शिव बनता है, कभी महावीर। सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 के ऐतिहासिक फ़ैसले में कहा था कि यह भ्रष्ट आचरण है और इसके आधार पर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 123 (3) के तहत चुनाव रद्द किया जा सकता है ।
प्रधानमंत्री दिग्विजयी भले हो जायें, लेकिन उन्होंने और उनके लोगों ने चुनाव में भ्रष्ट आचरण का सहारा लिया है। आज सुप्रीम कोर्ट इस भ्रष्ट आचरण पर चुप रहे, उसकी हिम्मत न हो या फिर उससे प्रभावित हो, लेकिन यह दाग़ तो दोनों पर क़ायम रहेगा। यह दाग़ उनके दिमाग़ और दिल में भी क़ायम रहेगा, जिन्होंने इसका छुपे या खुलेआम समर्थन किया।
ईडी टाइप की एजेंसी पर चुनाव के कम-से-कम तीन महीने पूर्व से बंदिश लग जानी चाहिए कि वह इस दौरान कोई हस्तक्षेप न करे। देखा यह गया कि विपक्षी के चुनाव प्रचार तंत्र को नष्ट करने के लिए उसके कार्यकर्ता को उसने चुनाव के ठीक पहले गिरफ्तार किया और चुनाव ख़त्म होते-होते उसे रिहा कर दिया गया। केंद्र सरकार की यह प्रैक्टिस सिर्फ़ चुनाव विरोधी नहीं है, बल्कि यह साबित करती है कि केंद्र सरकार को लोकतंत्र से कोई प्यार नहीं है। ईडी की ऐसी कार्रवाई, जिसे वह कोर्ट में साबित नहीं कर सके, उसके लिए ईडी के अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। यह कोई सामान्य बात नहीं है। यह बात जो मैं कह रहा हूँ, आज देश के एक समूह को भले नहीं लगे, जनता और बौद्धिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भी इसके खिलाफ रहे, लेकिन कम-से-कम जो देश से प्यार करते हैं, उन्हें एकजुट होकर बुलंद आवाज़ में इसकी मुखालफत करना चाहिए और मुहिम छेड़नी चाहिए।
सेना का मुख्य काम सरहद को सुरक्षित करना है या फिर आपातकालीन स्थिति में नागरिकों को मदद पहुँचाना है। उसका बेजा इस्तेमाल चुनाव में नहीं होना चाहिए। मणिपुर में क्या-क्या नहीं हुआ, वहाँ ढाई लाख सैनिक शांति के लिए आज तक नहीं उतारे गए। एक राज्य का चुनाव जीतने के लिए सैनिकों का इस्तेमाल बताता है कि हम जिस राज्य से असहमत होंगे, उस पर क़ब्ज़ा के लिए सेना का इस्तेमाल करते रहेंगे।
आज संभव है कि सभी विपक्षी दल इस पर न सोचे और सिर्फ़ अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहें। यह भी हो सकता है कि सचेत नागरिक सत्ता की विकरालता और उसकी धौंस का सामना न कर सके, लेकिन लोकतंत्र के अपहरण का यह जीता-जागता मिसाल है। हमने अगर आपसी खुन्नस को अतिरिक्त तरजीह दी तो यह याद रखिए कि आप भी इस चक्की में पीस दिए जाएँगे।
चुनाव आयोग चूँकि आज केंचुआ बना बैठा है, इसलिए इस बात पर ध्यान नहीं देगा कि चुनाव में असंभव और न पूरे होने वाले वायदे करना एक तरह की घुसखोरी है। होना यह चाहिए कि जो दल अपने वायदे पूरे न करें, उसका निबंधन रद्द करना चाहिए।
अंत में यह कि अगर हम सब चुप रहे तो कल के दिन न हम बोलने लायक़ रहेंगे, न लिखने लायक़ और जिस संविधान में आज़ादी के संघर्ष के मूल्य छिपे हैं, वह संविधान किसी कूड़ेदान की शोभा बढ़ा रहा होगा। कहने का अर्थ यह कि यह निराशा का वक़्त नहीं है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






