इन दिनों : हिपोक्रेट

"मौजूदा भारत में हिप्पोक्रेसी का बाज़ार सर्वोत्तम है। सरकार चाहे तो हिप्पोक्रेसी को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बोली लगा सकती है। हरेक दिशा में असफलता के बाद हिप्पोक्रेसी में वह गगनचुंबी छलाँग और सफलता प्राप्त कर सकती है।" - इसी आलेख से

आइए, अब एक नये युग में प्रवेश करें। इस युग को इस देश ने चुना है। इस युग में हिप्पोक्रेसी को बोया नहीं गया है, बल्कि उसकी फ़सलें लहलहा रही हैं। हिप्पोक्रेसी का अर्थ होता है- पाखंड, ढोंग या मिथ्याचार। हिप्पोक्रेट बहुरूपिया होता है। साथ ही बहुबोली भी। लोग उसे जल्द पहचान नहीं पाते, बल्कि वे खुद हिप्पोक्रेसी को सच मान कर उसमें रस लेने लगते हैं।

मौजूदा भारत में हिप्पोक्रेसी का बाज़ार सर्वोत्तम है। सरकार चाहे तो हिप्पोक्रेसी को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बोली लगा सकती है। हरेक दिशा में असफलता के बाद हिप्पोक्रेसी में वह गगनचुंबी छलाँग और सफलता प्राप्त कर सकती है। यह देश यों ही बार-बार ग़ुलाम नहीं हुआ। हिप्पोक्रेट लोगों ने देश को ग़ुलामी की जंजीरों में क़ैद करवाया। जिसकी बोली का ठिकाना नहीं, उसका इस धराधाम पर न ऐतिहासिक महत्त्व है, न समसामयिक। ’पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की लीक पर चलने वाले सिर्फ़ डींगें मार सकते हैं। हर दिन अख़बार देखता हूँ। नेताओं के बयान पढ़ता हूँ। ज़्यादातर बयान इस क़िस्म के होते हैं- ‘मैं यह कर दूँगा, मैं वह कर दूँगा।’ उससे होता कुछ नहीं। अपने सुख मौज के लिए वे जो कर दें। दो हज़ार करोड़ का विमान ख़रीद ले या अपने लिए आधुनिकतम चीज़ें ख़रीद ले। उससे देश उन्नत नहीं हो जाता।

साल भर सोना नहीं ख़रीदना है। नब्बे फ़ीसदी आबादी सोना ख़रीदने लायक़ है भी नहीं। शादी में किसी तरह से बहू-बेटियों के लिए मंगलसूत्र ख़रीद ले, यही बहुत है। दस फ़ीसदी जनता जो बाज़ार में सोना ख़रीद सकती है, वह ख़रीदती रहेगी। बढ़िया हो कि सोने की दुकान ही बंद कर दी जाए। नोटबंदी हो सकती है तो सोनाबंदी क्यों नहीं? देश के लिए व्यापारी इतनी क़ुर्बानी तो दे ही सकते हैं। जान तो दे नहीं सकते। कम-से-कम साल भर के लिए दुकान ही देश को दे दें। ईशा अंबानी का ब्लाउज़ महज दो सौ करोड़ का है। सोशल मीडिया पर यह ब्लाउज़ तैर रहा है। देशवासियों से आग्रह है कि वे विदेश यात्रा न करें, बल्कि वर्क फ्रॉम होम करें। और खुद पॉंच देशों की यात्रा पर निकल रहे हैं। चाय बेचनेवाले आजकल दो काम करते हैं- वे या तो चुनाव प्रचार करते हैं या फिर विदेश यात्रा करते हैं। वे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के समकक्ष होना चाहते हैं। चाहने से क्या होता है, कार्य और साहस भी वैसा होना चाहिए।

मिथ्याचार लाल बहादुर शास्त्री बनने का रास्ता नहीं है। उनका प्यारा शग़ल है मंदिर-मंदिर घूमना और शहरों में चेहरा चमकाने के लिए रोडशो करना। रोडशो में सड़क के दोनों ओर बाड़े लगे रहते हैं। पुलिस चप्पे-चप्पे पर बिछी रहती है। वह अपना मुखड़ा निकाल कर हाथ हिलाते रहते हैं। डरा हुआ आदमी मंच से बहुत ज़ोर-ज़ोर से बोलता है। मजा यह है कि उन्होंने जो वादे किए,ज़्यादातर मामले में उससे उलट उन्होंने काम किया, तब भी जनता ने वोट किया और थोड़ा बहुत घटा भी तो स्वार्थी लोगों ने नेताओं की आपूर्ति कर दी।

केंद्र तो केंद्र, बिहार के नेताओं के तो अपने जलवे हैं। बिहार के सद्यः नवजात शिक्षा मंत्री उवाचते हैं कि लड़कियों को बहुत पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। प्रधानमंत्री ने उसके लिए नारी वंदन विधेयक पास करवाया है। यह विधेयक ही लड़कियों का कल्याण करता रहेगा। मंत्री और मुख्यमंत्री नये आइडिया से लैस हैं। उम्मीद है कि देश का बंटाधार करने में अपना बहुमूल्य योगदान करते रहेंगे।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। ‘लोकजीवन’ का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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