परसों रात के नौ बज रहे थे कि एक आदिवासी युवक आया और कहा कि सड़क के पूरब तरफ़ बाघ ने एक गाय का शिकार किया है। जहाँ बाघ ने शिकार किया था, उसकी दूरी मुश्किल से पाँच सौ मीटर रही होगी। जिस रात बाघ ने शिकार किया, उसी रात हमलोग लगभग ग्यारह बजे रात को सड़क पर घूमने निकले थे। युवक ने यह भी कहा कि ढाई-तीन बजे हर दिन वह दहाड़ता है। युवक की बात सुनकर हमलोग डर गये थे। इसके बाद युवक उसी दिशा में निकल गया, जिस दिशा में बाघ ने शिकार किया था और हम सब ने घर के दरवाज़े ऐसे बंद किए कि जैसे बाघ दरवाज़े पर आ गया हो।
दरअसल बाघ बहक कर इधर-उधर आता रहता है। सरकार ने बान्धवगढ़ बाघ अभयारण्य बना दिया है, लेकिन यह बात बाघ को मालूम नहीं है। वह तो जंगल का राजा है। राजा सीमाएँ कहाँ मानता है? अतिक्रमण और उल्लंघन उसके स्वभाव में है। जो मतवाले और मनचले हैं, वे सीमाओं को चुनौती देते रहते हैं। बाघ तो बाघ है। उसने किसी स्कूल या विश्वविद्यालय में कोई डिग्री नहीं ली। जंगल के समाज का वह अघोषित राजा है। उसे कोई चुनाव भी नहीं लड़ना, न चुनाव का लंद-फंद करना है। दरअसल राजा को भी नहीं मालूम कि वह राजा है। प्रकृति ने उसे ताक़त दी है और उसके जबड़े और दाँत कठोर हैं। शिकार उनके स्वभाव का हिस्सा है। ऐसे प्राणी ख़ूँख़ार हो ही जाते हैं।
मनुष्य भी तो पहले जानवरों का ही शिकार करता था। वह बाघ से कम ख़ूँख़ार थोड़े था। अपने ख़ूँख़ारपना को जीतने के लिए ही इकट्ठे होते गये। परस्पर बातचीत करते और अपनी जैविक सुरक्षा के लिए वस्तुएँ इकट्ठी करते उसने बस्ती बसायी। फिर उसने नगर, शहर, महाशहर और संसार बनाया। लाखों समूहों से बना यह संसार तब भी अपनी ख़ूँखारपना को जीत नहीं पाया। आज वे जिस तरह से गली के कुत्ते की तरह झाँव-झाँव कर रहे हैं, उससे लगता नहीं है कि वह बाघ से बहुत अलग है।
जड़ों से उखड़े हुए लोग आदतन प्रेम, सद्भाव और सहकार से वंचित होते जाते हैं। माँ की गोदी, पिता से मिले व्यवहार, आस-पड़ोस के संबंधों की ख़ुशबू से अगर उखड़ गए तो फिर वे कहीं टिकते नहीं। स्थान बदलना जड़ों से उखड़ना नहीं होता, बल्कि अपनी जड़ों को भूल जाना सचमुच का उखड़ना होता है। कठिनाई यह होती है जिसे हम जड़ कहते हैं, वहाँ जाति, संप्रदाय, विभिन्न तरह के सामाजिक और आर्थिक विभेद भी हैं। ऐसे विभेदों में जो जीता है, वह दूर भागना चाहता है। वह अपनी जड़ों को भूलना चाहता है, बल्कि भूल रहा है। उसे उखड़ा हुआ जीवन पसंद है।
अगर गांधी और अम्बेडकर ऐसा ही करते तो वे न गांधी होते, न अम्बेडकर होते। दोनों ने अपने अपने तरीक़ों से जड़ों की बुराइयों और अच्छाइयों का आकलन किया। उन्होंने जितना भोगा , देखा, उसके अनुसार अपनी राय रखी और काम किया। गांधी के लिए देश की आत्मा गाँव में बसती थी, मगर अम्बेडकर उस गाँव को उजाड़ना चाहते थे। गांधी ने जाति के दंश को कम भोगा था। अम्बेडकर उसके शिकार थे। गांधी ने ग्राम-स्वराज की बात की और अम्बेडकर ने उस गाँव में आदमी को जीते-जी मरते देखा। वे भले ऐसे गाँव को क्यों पसंद करते, जहाँ आदमी को आदमी नहीं माना जाता था। गांधी और अम्बेडकर के प्रस्थान विंदु गाँव हैं और वे इसे नहीं भूलते। दोनों गाँव से संवाद करते रहे। गांधी जन्म से दलित नहीं थे, लेकिन दलितों की बस्ती में भी रहे और ख़्वाहिश ज़ाहिर की कि अगला जन्म दलित के घर ही हो।
गांधी की हत्या का बड़ा कारण उनकी तथाकथित हिन्दू धर्म के मनुवादी स्ट्रक्चर के ख़िलाफ़ लड़ाई के कारण 1948 में हुई और डॉ अम्बेडकर मृत्यु के थोड़े दिनों पूर्व 1956 में हुई। दोनों की हिन्दू धर्म से बेदख़ली हुई । एक को ज़बर्दस्ती से निकाल बाहर किया और दूसरे ने लंबी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के बाद हिंदू धर्म को तिलांजलि दे दी। उनके लिए यह मैदान ख़ाली हो गया और अब पूरे समाज और देश को मनुवादी स्ट्रक्चर हड़पने के लिए तत्पर है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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