कुहरे भरी सुबह। पेड़ों को उजले कुहरे ने घेर लिया है। बगीचे में मंज़र टिकोले बन रहे हैं। कोयल लंबी तान दे रही है। कोमल पत्तियों से आम के पेड़ चमक रहे हैं, लेकिन उन्हीं पेड़ों के तले बिखरी लाखों सूखी पत्तियाँ हैं। बगीचों की अपनी कथा है। सामूहिक बगीचे मृत हो रहे हैं, जहाँ बच्चे धमाचौकड़ी करते थे। हवा सिहकी नहीं कि बच्चे बगीचे की ओर। हवा आँधी जैसी हुई कि टिकोले गिरने लगे। बच्चे टिकोलों की लूट में आनंदित। उस वक़्त कोई उससे दुनिया के तमाम सुखों का भी प्रस्ताव करे तो वह उसे ठुकराने में देर नहीं करेगा। आँधी थमी। टिकोलों का भक्षण हुआ कि दोलपत्ते या राजा कबड्डी का खेल शुरू।
वक़्त ने करवट बदली। अब बच्चे बगीचे में दिखाई नहीं पड़ते। वे या तो अंग्रेज़ी स्कूलों की ओर मुख़ातिब हैं या कोचिंग संस्थान की ओर, और नहीं तो मोबाइल है ही। पहले बच्चे धूल और गरदे से भरे रहते। अब वे ज़्यादा सभ्य हो गए हैं। मुँह में बछड़ों की तरह मोखाली लगाए रहते हैं। बच्चे खेल-खेल में गिरते, चोट लगती। कहीं से ख़ून निकल आता। वे तुरंत उसका इलाज करते। तत्काल बहते ख़ून पर धूल डालते या भंगरोइया का रस लगाते या पेशाब भी कर देते। बस, इलाज हो गया। मेरे पाँव में अब भी घाव के कई दाग हैं, लेकिन मुझे याद नहीं कि घाव के इलाज के लिए किसी डॉक्टर के पास गया होऊँगा। स्कूल से आना। किताब-कॉपी को धरखा (दीवार में खोदी गई जगह) पर रखते। जैसे-तैसे खाना भकोसते और फिर गलियों में छूमंतर।
बच्चे अब समझदार हो गये हैं। अभिभावकों ने भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। वे बचपन से बच्चों को ट्रेनिंग देने लगते हैं और उनके अंदर महत्वाकांक्षाओं का ऐसा पेड़ उगा देते हैं कि वह पूरा जीवन इससे पीड़ित रहता है। प्रतियोगिता, जलन, ईर्ष्या। न पूरी होने वाली इच्छा। वे शिक्षण संस्थान भी कूढमगजी के भी शिकार हैं। उनका बचपन दौड़ में शामिल हो जाता है। बच्चे न सुबह के अरुणोदय देख पाते हैं, न अस्ताचलगामी सूर्य को। आसमान का चाँद भी उन्हें मुग्ध नहीं कर पाता, न नदी, न सागर, न हिम, न हिमाच्छादित शिखर। बच्चों को किताबों और नेट में झोंक दीजिए, फिर तो यंत्र ही बनेंगे और नहीं बन सके तो किसी कुकांड के शिकार होंगे। ऐसे ही बिगड़े बच्चों के मुँह पर ताले नहीं होते। वे किसी को कुछ भी कह सकते हैं। दूसरे को आस्तीन का साँप, नालायक, महामूर्ख, गद्दार आदि पदों से नवाजते हैं।
आप टीवी प्रवक्ता या सांसद होने पर कुछ भी बोल सकते हैं। घर में आग लगी है। एपस्टीन फाइलों के घरेलू संस्करण भी बाहर आ रहे हैं। गदहे की देह पर परफ़्यूम झिड़क देने से गदहत्व ख़त्म नहीं हो जाता। ऐसे गंदे पिटारे खुल रहे हैं कि देश बाद में अफ़सोस करेगा कि हमने किसे गद्दी सौंप दी थी। बच्चे मन के सच्चे, लेकिन जिससे सच्चाई सीखनी है, वह तो झूठ का पिटारा निकला। कितने गिरे हुए असंवेदनशील हैं लोग कि जिनकी माँ बीमार है, एक सामान्य हॉस्पिटल में इलाज हो रहा है, उस पर व्यंग्य करने से नहीं चूक रहे। ऐसे बेहूदे सांसद को पता नहीं है कि जो आज हॉस्पिटल में है, उसके शहीद पति ने उसके पूर्वज अटल बिहारी वाजपेयी का इलाज अमेरिका में करवाया था। कृतघ्न लोग जब पदों पर पहुँचते हैं और जिनके खुद के पाँव पाख़ाने में धँसे हों, वे कभी हो़शोहवास में नहीं रहते।
सच में संस्कार और संस्कृति पदों से नहीं आते, सद्व्यवहार से ही संभव है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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