ख़बरों की कोई कमी नहीं है। दुनिया ख़बरों में ही डूबी है। इतनी डूबी है कि कोई मरे या जीये, कोई मतलब नहीं। धीरे-धीरे शून्यता फैली जा रही है। घटनाएँ सभी तरह की हैं- यहाँ तक कि अनगिनत बलात्कार की, बलकृत परिवार की प्रताड़ना की, हत्या, चोरी, छिनरपन। इतनी दुर्घटनाएँ कि संवेदनाएँ सूखती चली जाती हैं। आदमी के साथ पशुओं से ज़्यादा निम्न कोटि के व्यवहार आम हैं। बातों से फिर जाना, लोभ के गले दबा देना, दारू-स्मैक का प्रचलन।
यह सचमुच विघटन का क्षण है। आदमी आख़िर है क्या? वह रूपया है? वह यशोलिप्सा की जंजीरों में क़ैद तुच्छ प्राणी है? वह काम है या मोक्ष? क्या है वह? उसकी चैतन्यता उसे सार्थक बनाती है या उसकी एकांतिकता। समाज से कटते जाना या जुड़ते जाना। भारत में शोर कैसा है? क्या जिस देश को अपने धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर पर बहुत गर्व है, वहाँ आदमी विभाजित है। कोई किसी के छू देने से परेशानी है। यहाँ तक कि मंदिरों में पत्थर की मूर्ति तक परेशान हो जाती हैं। वैदिक साहित्य, महाभारत, रामायण, उपनिषद आदि पढ़ कर लोग सँभल न सके। उनके मुँह में रामायण है या व्यवहार में नफ़रत और घृणा है? कहीं इन ग्रंथों में ही तो नफ़रत और हिंसा नहीं गूँथी है? ज्ञान इतना भटका हुआ क्यों है?
लगता है कि आज जगह-जगह प्रायोजित ढंग से ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर बहस करवाई जा रही है। वे खूब ज्ञान परंपरा की तलाश करें, लेकिन वे बतायें कि वे ज्ञान परंपराएँ इतनी निर्बल क्यों थीं कि भारतीय परस्पर घृणा करते रहे और देश ग़ुलाम होता रहा? कोई कारण तो रहा होगा! यह कैसे हो सकता है कि जिसका ज्ञान ऊँचे दर्जे का हो कि वह इतना पतित हो जायेगा कि कोई उसको विजित करे और वह सरेंडर करता जाए। देहरी पर मूँछें फड़काने वाला युद्ध के मैदान में फुस्स होता रहा है।
दरअसल समृद्ध इतिहास के साथ दोगलागिरी का भी इतिहास है। समृद्धि जैसे काँपती है, सीना नहीं तानती; डरती है, त्याग नहीं कर पाती। जब-जब भारतीयों ने सीना ताना है, उज्ज्वल प्रकाश फैला है. लेकिन जड़ मनुष्यों की भी एक समृद्ध अपसंस्कृति है, जो भारतीयों की चमक को धुंधली कर देती है। ज्ञान की समृद्ध और सच्ची परंपरा ही हमें सही रास्ता दिखला सकती है। राजनीति संस्कृति पर चढ़ बैठी है। लेकिन जीवन राजनीति नहीं है। जीवन प्रेम, करूणा, सत्य, संवेदना आदि भावनाओं से ओतप्रोत है। आज का पूरा दौर राजनीति केंद्रित हो गया है, नतीजा है कि साहित्य-संस्कृति, दर्शन जैसे विषय सूखते जा रहे हैं। साहित्य- संस्कृति जितनी विकसित होगी, जीवन उतना ही समृद्ध होगा।
मैं प्रारंभ में साइंस पढ़ रहा था। मैट्रिक के बाद भी टी एन बी कॉलेज, भागलपुर में इंटर (बायोलॉजी) में एडमिशन लिया। उस वक़्त साइंस की धूम थी। साइंस पढ़ने वाले बच्चों की इज़्ज़त बढ़ी-चढ़ी होती थी और माना जाता था कि तेज़तर्रार बच्चा साइंस पढ़ता है और आर्ट्स का बच्चा भुसगोल होता है। सो, बच्चा साइंस की ओर दौड़ लगाता था। कोई अपने को भुसगोल श्रेणी में क्यों रखे? आज हालत क्या है? जिस बच्चे ने इंजीनियरिंग की डिग्री ली, वह वस्तु हो गया है। सुबह निकलना और देर तक काम करना। जीवन तबाह है। आज लिटरेचर भी बच्चे इसलिए पढ़ रहे हैं कि उन्हें नौकरी आसानी से मिल जायेगी। हिन्दी की कक्षाओं में छात्र बढ़े हैं, लेकिन हिंदी के छात्र होते हुए भी, ज़्यादातर हिंदी के नहीं होते। वे न किताबें पढ़ते हैं और न पत्रिकाएँ ख़रीदते हैं। आज लिटरेचर की सख़्त ज़रूरत है और ऐसी शिक्षा प्रणाली की भी, जो बच्चों को मनुष्य बनाये, वस्तु नहीं। वस्तु बनकर आदमी संस्कृतिहीन हो जाता है और तब वह अपनी सार्थकता खोता जाता है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







