प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारह वर्षों के कार्यकाल की तेरह स्तर पर जाँच होनी चाहिए। पहला- उनकी सरकार ने किन-किन विपक्षी नेताओं को ईडी के माध्यम से धमका कर अपनी पार्टी में शामिल किया और बाद में बड़े पदों पर नवाज़ा? दूसरा- उन्होंने कितने वादे किए और गारंटी देने के बाद भी कितने को कूड़े में डाल दिया? तीसरा – उसकी पार्टी की आमदनी का स्रोत क्या है और किस-किस पूँजीपतियों ने कितना चंदा दिया और इस चंदे के बूते उसने कितना लाभ कमाया? चौथा- मीडिया को केंचुआ बनाने के लिए चैनल वालों पर सरकार ने कितने पैसे लुटाए? पाँचवाँ- विदेश यात्रा पर अब तक कुल कितने खर्च हुए? छठा- चुनावी सभाओं में उन पर कितने खर्च हुए? सातवाँ- उन्होंने ज्ञान-विज्ञान और इतिहास की दृष्टि से कितनी ग़लतबयानी की? आठवाँ- उनके मातृ संगठन आरएसएस के आर्थिक स्रोत क्या हैं? नौवां- आरएसएस के पंजीकरण न होने के बावजूद कितने सरकारी पैसे उस पर खर्च हुए? दसवाँ- आरएसएस के कितने कार्यकर्ताओं को विभिन्न विभागों में नियुक्ति की गई? ग्यारहवाँ- जेलों में कितने ऐसे लोग सड़ रहे हैं, जिन्होंने सरकार से असहमति व्यक्त की या उनके ख़िलाफ़ सड़क पर उतरे? बारहवाँ- उन्होंने किन-किन देशों से समझौता किया और क्या परिणाम निकले? तेरहवाँ- पीएम केयर फ़ंड में कितने रुपये आए और उन्होंने कितने खर्च किए?
जिस शुभेंदु अधिकारी को 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महा भ्रष्टाचारी कहा, न जाने कितने तीखे व्यंग्य किए, कैमरे के सामने घूस लेने का आरोप लगाया, उनके घर ईडी-सीडी को भेजा, उसे बंगाल का मुख्यमंत्री बनाया। उन्होंने पीठ थपथपाई और भीड़ के सामने दंडवत् हुए। शुभेंदु अधिकारी अकेले मुख्यमंत्री हैं, जिनका घूस लेते हुए सोशल मीडिया पर वीडियो वॉयरल है। उन पर शारदा घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला, नारदा घोटाला जैसे अन्य दाग़ भी हैं। हिमंत बिस्वा शर्मा पर तो पुस्तिका निकाल कर भ्रष्टाचार के आरोप उन्होंने गिनाए थे। वे भी असम के मुख्यमंत्री बना दिए गए।
राजनीति में खुला खेल फरुर्खावादी है। न लाज, न शर्म। रावण को तो दस मुख था। नेता को तो अनगिनत मुख हैं। बात पलटने की तो अद्भुत कला उनके पास है। गाँव का घोषित झूठा आदमी भी इतना झूठ नहीं बोल सकता। राजनीति के गिद्धों को मांस की पोटली थमाई जा रही है। मुझे लगता है कि भारत की मौजूदा राजनीति एक चक्रव्यूह में फँस गई है। इस राजनीति के लिए भ्रष्टाचार बहुत ज़रूरी है। अगर आप भ्रष्ट और बदतमीज़ नहीं हैं तो इस राजनीति से दूर रहिए।
आजकल बदतमीज़ी हर पेशे के लिए अनिवार्य शर्त है। यहाँ तक कि नामी-गिरामी संत होना है तो बदतमीज़ भी होइए और बलात्कारी भी। हरियाणा का एक संत राम रहीम है। बलात्कार के आरोप हैं। तब भी वे पेरोल पर बाहर ही रहते हैं और उनके भी पूजक हैं। आसाराम को भी शायद ज़मानत मिल गई है। रामभद्राचार्य कभी संत वाली भाषा नहीं बोलते। कुछ कथावाचक हैं, जो मनुस्मृति लाने पर तुले हुए हैं। बोली ऐसी कि किसी भी बदतमीज़ की बोली से कम घृणास्पद नहीं।
भारतीय समाज के ज़्यादातर कुकर्मी बड़े-बड़े पेशे की शोभा बढ़ा रहे हैं। समाज का चक्र घूम गया है। बहुत सोच समझकर मशहूर शायर शौक़ बहराइची ने लिखा था-
“बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था,
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा?”
उल्लुओं की जमात ने लोकतंत्र के कलपुर्ज़े पर क़ब्ज़ा जमा लिया है। उल्लुओं के राज से मुक्ति आज की एक प्रमुख चुनौती है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं। ‘लोकजीवन’ का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






