‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश की एक संस्मरणात्मक पुस्तक है- अक्स। अक्स का मतलब है – प्रतिबिंब, परछाई, छटा, छवि। आधी से ज़्यादा पुस्तक पढ़ चुका हूँ। रवींद्र कालिया कहानीकार भी थे, संपादक भी। उन्होंने समय-समय पर प्रेस भी चलाया। बहुरंगी प्रवृत्ति के थे। पहला विस्तृत संस्मरण उन पर ही केंद्रित है। उनके बहाने इलाहाबादी साहित्य परिदृश्य में मौजूद अनेक साहित्यिक की भी चर्चा है- अमरकान्त, मार्कण्डेय, सतीश जमाली, नीलकांत, उपेंद्रनाथ अश्क आदि आदि की। आपसी प्रेम, टकराव, हँसी-मजाक। फिर कवि मानबहादुर सिंह की।
मानबहादुर सिंह यों इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम ए थे, मगर उन्हें शहर रास नहीं आया। वे अपने गाँव के आसपास मास्टर हुए, फिर हेडमास्टर। उनकी दुखद मौत हुई। एक गुंडा उन्हें खींचते हुए सबके सामने से ले गया और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। तीसरी जो शख़्सियत हैं, वे डी पी त्रिपाठी हैं। उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति थी। वक्तृत्व कला में माहिर थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हुए। शुरुआती दौर में वे माकपा में थे। वहाँ से निकाले गए तो चंद्रशेखर के साथ चले गये। वे संसद सदस्य भी हुए। रवींद्र कालिया और देवी प्रसाद त्रिपाठी पीने-पिलाने के शौकीन रहे। यों जब रवींद्र कालिया कैंसरग्रस्त हुए तो उन्होंने शराब छोड़ी और चर्चित पुस्तक लिखी- ‘ग़ालिब छुटी शराब’। डी पी त्रिपाठी ने शराब- पान की सभी सीमाएँ तोड़ी।
मैं अस्सी के दशक में धनबाद में स्कूल-शिक्षक था। वहीं एक साहित्यिक सम्मेलन था। नामीगिरामी लोग आये थे। उन्होंने शराब का इतना भक्षण किया कि जिधर-तिधर लुढ़के नज़र आये। मेरे मन में साहित्यकारों की एक अलग छवि थी, जो उस दिन ध्वस्त हो गयी थी।
आज ख़बर है कि मोतिहारी में ज़हरीली शराब से पाँच की मौत। गांधी जी मोतीहारी में कितनी बार गये और आंदोलन चलाया। नीतीश कुमार ने शराबबंदी भी लगाई, लेकिन शराब है कि गली-मुहल्ले में भी मिल जाती है। भारत का जो प्रभुत्वशाली तबका है, जो देश चलाता है, सभ्यता-संस्कृति की बात करता है, उसके ओंठ भी तर हैं और नीचे का तबका जिसे कोई राह नज़र नहीं आती, वह भी मशगूल है। रह गया बिचौलिया। न पीता है, न पिला सकता है ।
शराब पीने के भी तर्क हैं और न पीने के भी। दोनों तरफ़ से तर्क चलते रहेंगे। आदमी तो आदमी, बल्कि आदमी ने जिसे गढ़ा है और अपना सबकुछ माना है, वह भी नशे की वस्तु लेने से परहेज नहीं करता। शिवजी तो भाँग-धतूरे के जैसे आदी ही हैं। तांत्रिक साधना में काल भैरव, माँ काली, देवी दुर्गा को शराब चढ़ायी जाती है। वेदों में सोम का उल्लेख है, जिसका पान इंद्र, अग्नि, वरुण आदि वैदिक देवता करते हैं। पंचमकार साधना में मांस, मदिरा, मत्स्य, मैथुन और मुद्रा है। वाजपेय यज्ञ की शुरुआत पाँच कप शराब से होती है। समुद्र मंथन के बाद वारुणी भी निकली है। कुछ दिनों पूर्व खजुराहो गया था। नवमी शताब्दी में चंदेल राजाओं ने इसे बनवाया। उसके दीवारों और अंदर भी बहुत महीन कारीगरी है। उसे देखकर दंग रह जाना पड़ता है, लेकिन दीवारों पर उकेरे गए काम-चित्रों में देख कर उस समय के समाज का पता चलता है – काम और नशा।
जो भी हो, पहली बात कि अतिरेक कभी अच्छा नहीं होता। दूसरी, जिस चीज़ से दिमाग़ या चेतना भटकती है, उसका सेवन नहीं होना चाहिए। तीसरी, जिससे स्वास्थ्य क्षतिग्रस्त हो, उसका भी त्याग कर देना चाहिए। चौथी, जिससे सामाजिक वातावरण आहत हो, उसे सीने से नहीं लगाना चाहिए।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






