इन दिनों : चौदह वर्ष के बाद गौ माता की क़ुर्बानी और राजनीतिक मिथ्याचार

"चौदह वर्ष तक की गाय माता रहेगी और उसके बाद उसे माता के पद से उतार कर उसकी गर्दन रेत देने में कोई दिक़्क़त नहीं है।" - इसी आलेख से

कलई तो खुलती है। रंगा सियार का रंग एक-न-एक दिन धुल जाता है। उन्होंने देश को बताया कि गौ हमारी माता है। लेकिन उनके प्रिय चिंतक सावरकर ने कहा कि गाय हमारी माता नहीं है, वह निरा पशु है। लेकिन कुछ लोग तुले हुए थे कि गौ को माता बनाकर ही रहेंगे। वैसे इन लोगों को गाय को माता बनाने से कोई मतलब नहीं था। असल मतलब था कि मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं को भड़काना और कुकृत्य कर सत्ता हासिल करना। वरना बीजेपी के दुलरूआ नेता किरण रिजिजू ने साफ-साफ स्वीकार किया है कि वे गोमांस खाते हैं। अरुणाचल प्रदेश में गोमांस का इस्तेमाल आम है। महान हिंदू नेता के नेतृत्व वाले उत्तर प्रदेश में गोमांस का व्यापार धड़ल्ले से होता है। राष्ट्र के गोमांस व्यापार में उसका योगदान 44 प्रतिशत है और हिंदू नेताओं के सिरमौर प्रधानमंत्री के संरक्षण में भारत दुनिया में गोमांस व्यापार में दूसरे स्थान पर क़ाबिज़ है।

कांग्रेस राज की तुलना में बीजेपी राज में गोमांस के व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। 2013-14 में भारत से गोमांस का निर्यात लगभग 13.65 लाख टन था, जो अब 15 लाख टन के स्तर को पार कर गया है। मजा यह है कि गोमांस के व्यापार में हिन्दुओं के बड़े-बड़े व्यापारी लगे हैं। बीजेपी ने बंगाल के चुनाव में भी खूब हिन्दू-मुसलमान किया। वर्तमान मुख्यमंत्री ने खूब तांडव मचाया। दरअसल उन्हें सच्चाई का पता नहीं था कि गौ माता के व्यापार में हिन्दुओं की बहुलता है।

लेकिन बक़रीद में मुसलमानों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि चूँकि हिन्दुओं के लिए गौ माता है, इसलिए वे गाय की क़ुर्बानी नहीं देंगे। इससे हिन्दू व्यापारी सरकार से ख़फ़ा हो गए और उसके डर से एक नया फ़रमान जारी किया कि चौदह वर्ष के ऊपर की गाय की क़ुर्बानी दे सकते हैं और मज़े में गोमांस का लुत्फ उठा सकते हैं। यानी चौदह वर्ष तक की गाय माता रहेगी और उसके बाद उसे माता के पद से उतार कर उसकी गर्दन रेत देने में कोई दिक़्क़त नहीं है। मुसलमान तो एक कदम और आगे बढ़ गये कि गाय के कारण ही अगर सब झंझट है तो वे गाय की क़ुर्बानी कभी नहीं देंगे। सरकार इसे राष्ट्रीय पशु का दर्जा दे दे। अगर हिंदू नेता को पशु पर ऐतराज है तो उसे राष्ट्रीय माता घोषित कर दे। इस पर नील बटा सन्नाटा पसरा है।

दरअसल बीजेपी नेताओं के कुकर्मो से देश बुरी तरह आहत है । अगर महँगाई बढ़ रही है तो इससे केवल मुसलमानों के घर तबाह नहीं हो रहे और न बेरोजगारी से सिर्फ़ मुसलमान-युवा बेरोजगार हो रहे हैं। बिगड़ती अर्थव्यवस्था के शिकार सभी हैं। शिक्षा और चिकित्सा की बर्बादी देश की बर्बादी है। लोग धीरे-धीरे इस सच्चाई को महसूसने लगे हैं। दरअसल वर्तमान सरकार ने दोनों हाथों से देश का पैसा लुटाया है और लूटने वाले उनके प्यारे व्यापारी मित्र हैं। इतनी बुरी दशा में भी वे बाज नहीं आ रहे।

पिछले कुछ महीनों में तेल कंपनियों की आमदनी में 41 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन अमेरिका-ईरान युद्ध के बहाने जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है। दरअसल नरेंद्र मोदी जी को अर्थव्यवस्था की बुनियादी चीज़ों का भी पता नहीं है। जब उन्होंने अचानक नोटबंदी की थी तो तीसमार बौद्धिकों ने खूब डंका पीटा था। उसके नतीजे से हम सब वाक़िफ़ हैं। नोटबंदी के बाद रंगे-बिरंगे दो हजरिया नोट आये। उसमें तो हमारे महान एंकरों ने चीप्स तक ढूंढ ली। बेचारा दो हजरिया नोट बाज़ार से ग़ायब ही हो गये। उसे न कोई बंद किया , न चलन से बाहर किया। वे खुद बाहर हो गए। जीएसटी से जनता की कम तबाही नहीं हुई। नरेंद्र मोदी जी तो आरबीआई तक को सँभाल नहीं पा रहे। अब लुटेरे आरबीआई में घुस कर करोड़ों उड़ा रहे हैं। बैंक तबाह हो चला है। कब कौन अपने को दिवालिया घोषित कर दे, पता नहीं। खतरे घंटी बज रही है। युवा एक बार फिर उमताने के लिए तैयार है। देश को एक नया, वैचारिक और संवेदनशील नेतृत्व चाहिए ।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

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