गाँव में होली पढ़-लिख कर तो मनाते नहीं थे। एक दिन अगजा यानी होलिका दहन, दूसरे दिन धुरखेल, तीसरे दिन गुम्मी और चौथे दिन गहमगट्ट होली। सात-आठ दिन पहले से किसी के बथान पर फगुआ। फगुआ की शुरुआत ‘होली खेले रघुबीरा अवध में’ से होती थी और रात जैसे-जैसे भींगती थी, धुरचट्ट गाली का प्रवाह होने लगता था। झाल और मृदंग। फगुआई रात में गजब का समाँ बँध जाता था। उन दिनों संसाधनों की बहुत कमी रहती थी। गरीबी झाँकती थी , लेकिन उत्साह की कोई कमी नहीं रहती थी। अगजा के लिए बच्चे घर-घर जाते। घर वाले लहरेठा (अरहर का डंठल) या गोयठा देते और साथ में पुआ -पूड़ी भी। गाँव में निर्धारित स्थल पर अगजा जमा होता। बच्चे घर घर अगजा माँगते समय यह भी टेबते (खोजते) रहते कि कोई और भी जलाने की वस्तु है, जिसे चुराया जा सकता है? हर वर्ष किसी न किसी की ढेंकी या खेतों में फसलों की जोगबाड़ी के लिए बनायी झोपड़ी या किसी का हल या पालो जरूर अगजा के हवाले होता। जिसकी ढेंकी या झोपड़ी जलती, वह दूसरे दिन खूब गालियाँ देता। बच्चे ही-ही कर हँसते।
धुरखेल के दिन गाँव की नालियाँ साफ हो जातीं। बाल्टी में नाली का कीचड़ लेकर जो धुरखेल होता, उसका कोई जोड़ा आज तक उपलब्ध नहीं है। धुरखेल की शुरुआत धुर यानी धूली से होती और फिर रंग चढ़ने लगता। रंग चढ़ते-चढ़ते कादो, फिर किच्चड़ और फिर नाली की बदबूदार कीचड़। बदबूदार कीचड़ भी ठहाकों का अपूर्व माध्यम होता। होली के दिन बहुत कम बच्चे होते जिसके शरीर पर नये कपड़े और पिचकारी होती। ज्यादातर की जेब में पुड़िया वाला रंग होता। बच्चे किसी के माथे या किसी को पकड़ कर दाँतों में रंग घिस देते। भौजाइयों की तलाश होती। होली में बंधन के सभी फाटक खुल जाते और ऐसे-ऐसे फैकड़े पढ़े जाते कि उनको दर्ज करना मुश्किल है। नवोन्मेषी मन तरह-तरह की रचना करते। होली की दोपहर के बाद देवी-स्थान पर जमावड़ा लगता। बूढ़े मृदंग पर होते, कुछ झाल बजाते और गीत शुरू होता। भंग भी छनती, रंग भी चलते। रात घिरने लगती तो मृदंग और झाल घर-घर पर जाने के लिए तत्पर होते। घर वाले भी यथासंभव कटुक, पूड़ी-पुआ तैयार रखते। भांग खाने के बाद किसको होश रहता है कि कितना खाया है और कितना नहीं! आज की दृष्टि से उनमें असभ्यता के बहुत से लक्षण हैं, लेकिन असभ्यता में खुशियों की जो नदी बहती, वह अपूर्व थी। मेरे मन के कोने में सबकुछ ठहरा हुआ है। निथरी हुई यादें होली के हर साल धड़कनें लगती हैं।
शहर आया तो अज्ञेय की कविता ‘साँप’ की दशा भोग रहा हूँ –
“तुम सभ्य तो हुए नहीं नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। एक बात पूछूँ--(उत्तर दोगे?) तब कैसे सीखा डँसना-- विष कहाँ पाया?”
न शहर का सभ्य हो पाया, न देहात का असभ्य रह पाया। स्वभाव ऐसा था कि शहर लील नहीं सकता था, मजबूरी ऐसी थी कि शहर छोड़ नहीं सकता था। खैर।
इधर के दिनों में सभी हिन्दू पर्वों की व्याख्या हो रही है। होली की भी। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा में मन प्रह्लाद के पक्ष में रहता था। इधर पता चला कि प्रह्लाद का तो इस्तेमाल किया गया। हिरण्यकश्यप बहुजनों का सम्राट था और वह श्रमण संस्कृति का उन्नायक था। होलिका वैज्ञानिक थी, जिसे आग में जानबूझकर जलाया गया। होली के अंदर की कथा जब उलटी हो गई तो होली का उत्साह भी थम गया। बावजूद इसके होली ठहरी नहीं है।
दरअसल उत्सवी मन मात्र उत्सव देखता है। ह्रदय को तो रस चाहिए। दिमाग को ज्ञान। जो भी हो, भविष्य के लिए यह जरूरी होगा कि नागरिक समाज नये-नये उत्सवों की बुनियाद रखें, तभी संस्कृति की नयी कल-कल नदी बह सकती है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






