पुष्कर में ब्राह्मणों की एक बैठक हुई, जिसमें एक संगठन बना- ब्राह्मण सिविलाइजेशनल आईडेंटिटी फ्रेमवर्क। इस संगठन का पहला काम होगा – ब्राह्मण आइडेंटिटी की तलाश। अब जब ब्राह्मणों को ही आइडेंटिटी की तलाश है तो सैकड़ों पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियाँ क्या करे? जब समाज पर हज़ारों वर्षों से प्रभुत्व है, उसे और भी प्रभुत्व चाहिए तो जो बहुसंख्यक हैं, उन्हें कुछ चाहिए या वे छाडन पर रहेंगी।
ब्राह्मणों को और आरक्षण चाहिए। संविधान को रौंद कर दस प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। इनकी माँग है कि उसे चौदह प्रतिशत आरक्षण चाहिए। यूजीसी बिल इन्हें नहीं चाहिए, क्योंकि इन्हें लोकतंत्र में जातियाँ बहाल करने और नब्बे प्रतिशत जनता को रौंदने का अधिकार चाहिए । क्षत्रिय की भी क्षत्रिय-चेतना प्रबल है ही। इनकी करणी सेना अपना शौर्य प्रदर्शन करती रहती है। भूमिहारों की भी ब्रह्मर्षि सेना है। सबकी अपनी सेना है। अपने करम हैं। अपने धरम हैं। जातीय विद्वेष को तीव्र करने की अपार क्षमता है, क्योंकि वे सामाजिक सत्ता में भी पावरफुल हैं और नौकरी-पेशे में तो राज करते हैं। इनके अंदर अन्य भारतवासियों के लिए बहुत कम स्पेस है।
यही वह वर्ग है जो फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद के बहाने अन्य जातियों के दिलों-दिमाग़ पर क़ब्ज़ा कर रखा है। इन्हें जाति चाहिए, क्योंकि ये परम पवित्र हैं। इन्हें अन्य जातियों की छाती को कुचलने का अधिकार चाहिए। जो जातियाँ आरक्षण के खिलाफ कुहराम मचाती थीं और योग्यता को लेकर चिल्लपों करती थीं, उन्हें अब ज़्यादा-से-ज़्यादा आरक्षण चाहिए।
पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों को गर्वोगुमान का आधार चाहिए। उनमें से बहुत लोग चंदन टीका लगाकर और धार्मिक स्थलों पर घंटा बजाकर अति आनंदित हैं। इन्हें पता ही नहीं है कि उन्हें जीते-जी नरक में धकेल दिया गया है। जिन्हें जातियों के ख़िलाफ़ प्रतिवाद में खड़ा होना था, वे जातियों की लाइन में लग गए। डॉ भीमराव अम्बेडकर की दुहाई देने वाले या डॉक्टर लोहिया या महात्मा गांधी के परम शिष्य कहाँ हैं? सबके सब हमाम में नंगे हैं।
भारत में सदियों से जातियों का राज रहा है, अब भी है। मौक़े-बेमौके जाति-स्ट्रक्चर तोड़ने की कोशिश हुई, लेकिन पुनः वहीं पहुँच गई। भारत की त्रासदी यह है कि यह अपने पुरानेपन में अपना अस्तित्व ढूँढ रहा है। औपनिवेशिक सत्ता के ख़िलाफ़ लड़कर जो नयी चेतना आयी थी, वह निगली जा चुकी है, इसलिए भारत की जनता ने उसे गद्दी सौंप दी है, जो आज़ादी की लड़ाई के या तो गद्दार थे या अंग्रेज़ों के चमचे।
हम एक अँधेरी गुफा में धँसते जा रहे हैं, जहाँ अपनी मौत का ही उत्सव मनाने की तैयारी कर रहे हैं। अगर पढे-लिखे ब्राह्मण जाति-श्रेष्ठता से पीड़ित हैं तो उस पढ़ाई और ज्ञान का कोई मतलब नहीं है। सदियों से यह पढ़ाई और ज्ञान भारत को कुचलता रहा है। अब भी देश में जो पढ़ाई चल रही है, वह नये भारत के लिए नहीं है। नाम नई शिक्षा नीति है, लेकिन करम ग़लीज़ भारत का है। जो भी नये भारत के सोचक हैं, वे अपने गर्वो-गुमान में माते हुए हैं। वे या तो संकट को परख नहीं रहे या फिर इसी स्ट्रक्चर के पक्षधर हैं। नये स्ट्रक्चर के लिए नयी प्रेरणा और नये विचार चाहिए। भारत का मौजूदा स्ट्रक्चर जनविरोधी है, इसलिए निर्लज्ज समझौते में भी वीरता ढूँढ रहा है।
यह देश यों ही लंबे समय तक ग़ुलाम नहीं रहा। जातियों के दड़बों में क़ैद इन लोगों में कभी एकता आयी नहीं। आज़ादी की लड़ाई में थोड़ी एकता दिखी, लेकिन फिर साज़िश का शिकार हो गयी। अब वह उस दौर में है, जहाँ ग़ुलामी ही प्यारी लगती है। कुत्तों की यह फ़ितरत होती है कि मांसविहीन सूखी हड्डी चाभते-चाभते अपनी जिह्वा से बहते ख़ून को ही चुभलाने लगता है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







