अमौरी यानी टिकोले मेरी कमजोरी रही है। उसे देखकर मन लहक जाता है। आजकल सुबह-सुबह टहलने जाते वक़्त एक बगीचे से होकर गुज़रता हूँ और छोटी-बड़ी अमौरियॉं चुन कर जेबें भर लेता हूँ। मैं और अलका आते-जाते वक़्त बड़ी होती अमौरियों, फूलों, पक्षियों, खीरे-परोल की टटकी लत्तरों, सूरज के उत्तरायण होते जाने पर बातें करते रहते हैं। जितने मंज़र आये थे, उतने फल नहीं लगे। जिनमें फल नहीं लगे, उनमें बरबरा कर नवजात पत्ते आ गए।
एक बड़ा-सा पीपल का पेड़ है, उसके सभी पत्ते झड़ गए हैं। फुनगियों पर ललहून-सी छोटी पत्तियाँ दिखती हैं। सुबह स्वामी विवेकानंद का एक लेख पढ़ रहा था- ‘अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है।’ काम करो, लेकिन उसमें आसक्त न हो। अनासक्ति का चरम रूप जैन धर्म में दिखाई देता है। जैन धर्म मानता है कि हम जो जीते हैं, उसमें छोटे- छोटे पौधे और जंतुओं की हत्या होती है । जैन धर्मावलंबी कोशिश करते रहते हैं कि वे कम-से-कम संसार के संपर्क में रहें और अंततः जैन साधु अवागमन से मुक्ति को चरम लक्ष्य मान कर मृत्यु का वरण करते हैं।
और लोगों की बात क्या करूँ, मुझे प्रकृति के अपरूप मोहते हैं। रस से पूर्ण। मनुष्य की भावनाओं की दुनिया से कोई अलग कैसे रह सकता है? जीवन-रस के बिना जीवन क्या है? आसक्ति में किसी से चिपटे या लिथडे रहने का भाव आता है। प्रकृति तो मनुष्य को विराटता का अहसास कराती है और मुक्ति का भी। उसका रस आसक्त नहीं करता।
भावनाओं के अपने खतरे हैं। उसके रस मुक्त भी कर सकते हैं और आसक्त भी। मॉं-दादी, पिता, भाई, भाभी, कई दोस्त- नहीं रहे, लेकिन भावनाओं के तार जुड़े हैं। वर्तमान में भी भावनाओं की अनेक शाखाएँ हैं, जिनमें बैठा हूँ या कहें जो मेरे सीने से गुज़रती हैं। मुझे बनाने में ये भावनायें ही तो हैं। वरना, मैं क्या हूँ? संसार में रह कर संसार से मुक्त रहना बहुत कठिन है। मेरे जैसे लोगों के लिए तो लगभग असंभव। मोहन राकेश ने एक नाटक लिखा- ‘लहरों के राजहंस‘। नाटक की नायिका सुंदरी कहती है- “लोग कहते हैं कि गौतम बुद्ध ने बोध प्राप्त किया है, और कामनाओं को जीता है। पर मैं कहती हूँ कि कामनाओं को जीता जाए, यह भी क्या मन की एक कामना नहीं है और ऐसी कामना किसी के मन में क्यों जगती है? ”
संसार से मुक्त होने की कामना भी क्या एक कामना नहीं है? मनुष्य भावनाओं और विचारों की दुनिया में छटपटाता रहता है। जन्म लेता है तो मन विराट रहता है। परिवार और समाज के बीच रहते हुए संकीर्ण होता जाता है। उसकी विराटता औंधी होती जाती है। सिकुड़ती जाती है। दर्शनशास्त्र और साहित्य में क्या यह अंतर है कि एक में डिटैचमेंट है और दूसरे में अटैचमेंट। साहित्य वही महत्वपूर्ण होता है, जिसका समाज से नाभिनाल संबंध होता है। पारलौकिक बहुत चीज़ें उसे नहीं सुहातीं, जबकि दर्शन का एक सिरा पारलौकिकता से जुड़ा होता है।
दर्शन प्राथमिक शास्त्र है। दर्शन से ही हरेक शास्त्र का जन्म हुआ है। यहाँ तक कि विज्ञान का भी। आज दर्शनशास्त्र बच्चे पढ़ना नहीं चाहते। वह उपयोगी नहीं रहा। वह नौकरी नहीं दिला सकता। लगता है कि जैसे परिवार में बूढ़े-बुढ़ियों की हालत है, वही हालत शास्त्रों के बीच दर्शनशास्त्र की है। दर्शन भारत का प्रिय विषय रहा है, लेकिन आज अप्रिय हो चला है। लोगों को वह फूड ही चाहिए जो इंस्टेंट हो।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







