बिहार की राजनीति ने करवट ली है या राजनीति पहले वाली पटरी पर चल रही है, इस पर बहस बेमानी है। जो राजनीति है, इसमें बदलाव की संभावना न के बराबर है। बिहार की राजनीति का स्थायी भाव है- दृष्टिहीनता। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनते ही तरह-तरह के क़िस्से गढ़े जा रहे हैं। उनके मुख्यमंत्री बनते ही एक पोस्टर छपा- सम्राट अशोक के साथ सम्राट चौधरी का।
आजकल पुराने जितने राजे-रजवाड़े हैं, सबकी जातियों पर शोध हो रहा है। सम्राट अशोक कुशवाहा घोषित हो चुके हैं। हर जाति ने अपने नायक ढूँढ लिया है। आज़ादी की लड़ाई में वैसे नायक ढूँढे जाते थे, जिन्होंने देश के लिए शहादत दी हो। अब जब खा-पीकर तगड़े हो रहे हैं तो देखादेखी हरेक जाति ने अपने-अपने नायकों की तलाश शुरू की। क्षत्रिय से लेकर ब्राह्मण तक और यादव से लेकर भंगी तक- जातियों को लेकर आग्रह तीव्र हुए हैं।
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनते ही दो जातियों के नेता अति व्याकुल हैं- राजपूत और भूमिहार। उन्हें लगता था कि नीतीश कुमार के जाने के बाद उनकी जाति के नेता ही मुख्यमंत्री होंगे। ब्राह्मण नेताओं में बहुत उथलपुथल नहीं है, लेकिन उपरोक्त दोनों जातियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में रोष है। इन्हें मालूम नहीं है कि बिहार की राजनीति में जाति को अतिरिक्त तरजीह चार जातियों के नेताओं ने दी- भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ। कांग्रेसी राज में इनकी ही चलती थी। मौक़ा पाकर ये सब जातियॉं बीजेपी में शिफ़्ट कर गयीं। पहले इनके नायक गांधी-पटेल-नेहरू थे, अब ये सावरकर पंथी हो गए और गांधी-नेहरु के आलोचक। जब इनकी बुद्धि इस तरह दौड़ रही थी तो इसके दुष्परिणाम तो आने ही थे। कहावत है न- रोपे पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय।
मजा दूसरी ओर भी है । तेजस्वी यादव कह रहे हैं कि सम्राट चौधरी ने लालू स्कूल में पढ़ाई की है। बीजेपी की मजबूरी है कि उसने सम्राट चौधरी का चयन किया। वास्तविकता यह है कि डॉ लोहिया-कर्पूरी ठाकुर की समाजवादी राजनीति को सँभालने की कूबत किसी में नहीं थी। डॉ लोहिया परिवारवाद के खिलाफ थे, लेकिन लालूजी ने अपनी राजनीति में परिवार को अतिरिक्त तरजीह दी। सत्ता इनकी राजनीति के केंद्र में आ गयी और समाज क्रमशः दूर छिटकता गया। जाति तोड़ने की लड़ाई थम गई और जाति जोड़ने की लड़ाई शुरू हो गयी। आज बिहार की राजनीति सिद्धांतों पर नहीं, जातियों के खंडन-मंडन पर टिकी है।
सिद्धांतहीन राजनीति यहाँ तक चली आई है कि अब देश के नायक न गांधी हैं, न डॉ लोहिया और न ही भगत सिंह। इसकी वजह यह है कि ये वोट नहीं दिला सकते। यहाँ तक कि गांधी के लिए अपशब्द बके जाते हैं। जो लोग इतना कृतघ्न हैं कि अपने पूर्वजों का सम्मान नहीं कर सकते, न विरासत सँभाल सकते हैं, उनका कोई भविष्य नहीं है।
आज समता की लड़ाई लड़ना हमारी सिर्फ़ ज़रूरत और ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि देश बचाने और उसके पुनर्निर्माण के लिए ज़रूरी है। साधु-संत तक मवालियों की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। नेताओं का तो कोई ठौर-ठिकाना नहीं है। प्रधानमंत्री की भाषा दोयम दर्जे की है तो विपक्ष के नेता भी जब प्रधानमंत्री को तू के स्वर में संबोधित करते हैं, तो मन को गवारा नहीं होता। अपनी बात कहिए। आलोचना कीजिए, लेकिन गाली की भाषा को राष्ट्र की भाषा मत बनाइए।
खैर। सुबह बादल था आकाश में। ठंडी हवा भी बह रही थी। टहलने जाता हूँ तो एक स्थल पर बेली की हज़ारों सफ़ेद कलियाँ टहनियों पर लरजती रहती हैं। बेली वैसे भी आधी रात को खिलती है। मगही गीत है- ‘अरे रामा, बेला फूले आधि राति, चमेली भिनसारे रे हारी।’ बेली आधी रात खिलती है और चमेली भिनसारे मतलब सुबह। आम बड़े होने लगे हैं। टहनियाँ झुकने लगी हैं। नम्रता माँ के स्वभाव का अनिवार्य गुण है। आम के पेड़ मॉं बन गये हैं। मैं हर सुबह देखता हूँ कि सैकड़ों अमौरियॉं धरती पर पड़ी रहती हैं।
क्या माँ को अमौरियों से बिछड़ने का दुख नहीं होता होगा? या ये ऐसी अमौरियॉं हैं, जो जीने लायक़ नहीं थीं और माँ के सिर बोझ थीं? या यह भी संभव हो कि इन अमौरियों के लिए कोई स्पेस नहीं हो, जैसे आज करोड़ों बच्चों के लिए देश में स्पेस नहीं है। वे बच्चे जो प्लास्टिक की ख़ाली बोतलें चुनते, स्टेशनों पर हाथ पसारते या चोरी करते मिल जाते हैं या फिर अपने को निरर्थक समझ आत्महत्या कर लेते हैं। कितने बच्चे असमय बड़े हो जाते हैं और संसार से चल पड़ते हैं। देश की राजनीति ऐसी है कि सम्राट बहुत हैं, लेकिन वे अपनी संतति को पालने में असमर्थ हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







वस्तुपरक विवेचना. कितना सटीक व्याख्या की है मौज़ूदा सयासी हालात में जातीय योद्धाओं को लेकर . सलाम
धन्यवाद भगवान बाबू 🙏