12 अप्रैल, 26 को कला केंद्र, भागलपुर में बच्चे-कवियों की प्रतियोगिता चल रही थी। मैं एक कोने में बैठ कर उनकी कविताएँ सुन रहा था कि मोबाइल के स्क्रीन पर एक भयावह उदास ख़बर आई- ‘महान गायिका आशा भोंसले नहीं रही।’ आशा भोंसले से मैं कभी मिला नहीं। बंबई में कुछ महीने रहा था। गुलज़ार से मिलना हुआ है। बंबई में टिका रहता तो आशा भोंसले से भी मुलाक़ात हो जाती। कम-से-कम क़रीब से देख तो लेता। उन्हें टेलीविज़न की स्क्रीन पर देखता रहा हूँ। इतनी सहज-सरल और अहंकारहीन कलाकार।
फिल्मी दुनिया में अस्सी वर्ष, बीस भाषाओं में गायन और बारह हज़ार से ज़्यादा गीत। ‘हम दोनों’ फ़िल्म का गाना है- ‘अभी न जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं।’ साहिर लुधियानवी का गीत और मुहम्मद रफ़ी और आशा भोंसले के स्वर। पर्दे पर देवानंद और साधना का अभिनय। गाने में प्रेम की तरलता और उसकी अविरल धारा मध्यम-मध्यम बहती है, ह्रदय को भिगोती हुई। वर्षों बाद भी यह मधुर गीत पीछा नहीं छोड़ता –
हवा ज़रा महक तो ले, नज़र ज़रा बहक तो ले ये शाम ढल तो ले ज़रा ये दिल सँभल तो ले ज़रा मैं थोड़ी देर जी तो लूँ, नशे के घूँट पी तो लूँ
के बाद आशा जी का स्वर उभरता है –
सितारे झिलमिला उठे, चराग जगमगा उठे बस अब न मुझको टोकना, न बढ़के राह रोकना अगर मैं रुक गई अभी तो जा न पाऊँगी कभी जो मैं रुक गई अभी तो जा न पाऊँगी कभी यही कहोगे तुम सदा कि दिल अभी नहीं भरा जो ख़त्म हो किसी ज़गह ये ऐसा सिलसिला नहीं।
जो ख़त्म हो किसी जगह ये ऐसा सिलसिला नहीं– लेकिन सिलसिला ख़त्म हुआ। आशा भोंसले नहीं रही। मधुर गायन का सिलसिला भी थम गया।
‘लगान’ फ़िल्म का एक गीत है- ‘राधा कैसे न जले।’ जावेद अख़्तर ने लिखा है और गाया है – उदित नारायण और आशा भोंसले ने। राधा की जलन से प्रेम का उद्घोष। कन्हैया राधा के अलावे किसी गोपी से मिले, मुस्कुराये, उसे छेड़े और बात करे तो फिर राधा का ह्रदय क्यों न जले? राधा को समझाया जाता है कि गोपिकाएँ तो तारे हैं, चाँद है राधा, गोपिकाएँ तो आनी-जानी हैं, राधा मन की रानी है। कन्हैया तो साँझ-सकारे सिर्फ़ राधा-राधा ही रटते हैं। मगर राधा तो राधा है। इस गाने में आशा भोंसले ने जो हरकतें लीं हैं, उसने सामान्य गाने को अभूतपूर्व ख्याति प्रदान की।
गुलज़ार ने एक कविता लिखी थी- मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है। आशा भोंसले ने इसे गाया। मैंने सावन को अपने गाँव में महसूस किया है- भीगे-भीगे दिन, ठंडी-कच्ची हवा, दूर-दूर तक हरी होती धरती। जब गुलज़ार का लिखा और आशा भोंसले का गाया सुनता हूँ – ‘सावन के कुछ भीगे दिन रखे हैं / और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पड़ी है/ वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो– तो एक मुसाफ़िर की यादों का सिलसिला खुल जाता है। एक अकेली छतरी में जब आधे-आधे भीग रहे थे / आधे सूखे आधे, गीले सूखा तो मैं ले आयी थी/ गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो/ वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो– कोई क्या लौटाए, कैसे लौटाए। लौटना संभव नहीं और यही असंभावना रोमांस पैदा करती है। बीते दिनों की मधुरिमा ह्रदय को लपेटती है ।
सैकड़ों गाने का उल्लेख किया जा सकता है, जिसे आशा भोंसले ने गाया। मुझे लगता था कि इस कलाकार के सम्मान में भारत का राष्ट्रीय ध्वज को कम-से-कम एक दिन के लिए तो झुका ही देना चाहिए था। लेकिन जिस युग में ज्ञान चुप-चुप हो और अज्ञानता सिर चढ़ कर बोले, वहाँ कलाकार की महत्ता को कौन समझे? नेता समझें, न समझें, आशा भोंसले अपने स्वर के लिए अमर और कालजयी रहेंगी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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