भारत क्या अमेरिका का उपनिवेश है या वह अमेरिका का गुलाम है? वह हुक्म चलाता है और प्रधानमंत्री जी हुज़ूर, जी हुज़ूर कर रहे हैं। खून-पसीने बहा कर देश को आज़ादी मिली है। एक नहीं, हज़ारों भगत सिंह ने आज़ादी के लिए शहादत दी है। क्या उनके खून के बदले हमने इतना ही सीखा कि 2026 में अमेरिका हमें बताये कि हमें क्या करना है और क्या नहीं?
अमेरिका के वित्त मंत्री कह रहे हैं कि भारत हमारी सब बात मानता है, इसलिए उसे तीस दिनों तक रूस से तेल ख़रीदने की छूट देते हैं। कुछ महीने पूर्व रायसीना डॉयलॉग हुआ था, जिसमें प्रधानमंत्री खुद भी मौजूद थे। उसी मंच से अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी क्रिस्टोफर लैंडो ने कहा-“भारत को यह समझना चाहिए कि जो गलती अमेरिका ने चीन के साथ की थी, वह भारत के साथ नहीं करेगा कि हम आपको आगे बढ़ने दें और आप आगे चलकर हर चीज में हमसे आगे निकल जाएँ। हम जो भी करेंगे, हम सुनिश्चित करेंगे कि अमेरिका के लोगों के लिए सब कुछ न्यायसंगत हो।”
पाकिस्तान-भारत युद्ध रुकवाने की घोषणा वह करता है। व्यापार समझौते की वह घोषणा ही नहीं करता। वह बार-बार टैरिफ़ लगाने की धमकी देता है और भारत के प्रधानमंत्री न केवल चुप रहते हैं, बल्कि जो ट्रैरिफ मात्र तीन प्रतिशत था, वह 18 प्रतिशत हो जाता है और अमेरिका पर जो टैरिफ़ 12 प्रतिशत था, वह शून्य हो जाता है। सचमुच यह कितना दुर्भाग्य है कि भारत के प्रधानमंत्री को चुनती है जनता और प्रधानमंत्री अमेरिका के आगे नतमस्तक हैं। प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, बीजेपी के कार्यकर्ताओं को क्या लकवा मार गया है? आर एस एस के सर संचालक केवल हिन्दुओं को अतिरिक्त बच्चे ही पैदा करने का फ़रमान जारी करेंगे या फिर बच्चों में स्वाभिमान भी भरेंगे? आज़ादी की लड़ाई में नाखून भी जिन्होंने नहीं कटाया, वे आज़ादी की रक्षा भी कैसे करेंगे?
यह सब देख कर लगता है कि संप्रदायवादियों के पास और कुछ रहता हो, स्वाभिमान और विवेक नहीं रहता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मजबूरी क्या है, वे समझें, लेकिन देश की संप्रभुता को जलील करने की इजाज़त किसी को नहीं है। विश्व में पिछले ग्यारह वर्षों से हल्ला मचा रखा था कि पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। प्रधानमंत्री ने विदेशी दौरे पर अरबों रूपये लुटाए और जिसका कुल नतीजा है कि वे ट्रंप के ट्रैप में हैं। सच पूछिए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तत्काल इस्तीफ़ा दे देना चाहिए, न दें तो भारतीय जनता को संवैधानिक अधिकार है कि वे ऐसे प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा ले लें। जब पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद की सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे तो भूमि पर लोट कर संसद को नमन किया था। जो अतिरिक्त रूप से विनम्र होता है, वह अतिरिक्त रूप से ख़तरनाक होता है।
निर्धन होना उतना बुरा नहीं है, जितना कंगाल होना। देश आज कंगाली के दौर से गुजर रहा है। उधर ट्रंप खुद एपिस्टीन फ़ाइल की गिरफ़्त में हैं। अमेरिकी न्याय विभाग ने एपिस्टीन से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किया है, जिसमें एक महिला ने दावा किया है कि जब वह नाबालिग थी तो ट्रंप और यौन अपराधी जेफ्री एपिस्टीन ने यौन शोषण किया था। राजा युद्ध और यौन संबंध के शौक़ीन होते हैं। कहने को दुनिया में अनेक देशों में लोकतंत्र है, लेकिन आज जो उनके व्यवहार हैं, वे ऐय्याश राजा से कमतर नहीं हैं। ऐसे राजा न अपने राज्य का स्वाभिमान बरकरार रख सकते हैं, न अपना। भारत तो ऐसे ही लोगों की करतूतों से लंबे समय तक गुलाम रहा है। अभी उसने उड़ान भरी भी नहीं है कि देशद्रोही लोग उसके पंख तोड़ने लगे हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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