आपदा में अवसर सरकार ढूँढती रहती है। पिछले कुछ वर्षों से आपदा में सरकार और पूँजीपतियों के खूब मज़े हैं। आपका बेटा किसी अन्य शहर में बीमार है। आपको अचानक जाना है। मन बेचैन है। आपदा परिवार पर है। आप प्लेन या रेल से जाना चाहते हैं। प्लेन में जो टिकट छह हज़ार में मिलता था, वह बारह हज़ार में मिल रहा है। ट्रेन में तत्काल है और तत्काल नहीं है तो प्रीमियम है। प्रीमियम में भाड़ा फ़िक्स नहीं है। जैसे-जैसे यात्रा क़रीब आयेगी, टिकट की क़ीमत आसमान छूती जाएगी। आपदा में आपको कोई राहत नहीं मिलेगी। आपकी आपदा सरकार और पूँजीपतियों के लिए वरदान है ।
खाड़ी युद्ध ने गैस-डीज़ल-पेट्रोल बेचने वाली कंपनियों के लिए शानदार अवसर प्रदान किया है। गैस के दाम साठ रुपये उछल गए। सिलिंडर की किल्लत बाज़ार में है। होटल बंद हो रहे हैं। लॉज में रहने वाले छात्र गैस के लिए बौख रहे हैं। ऐसे मौके पर सरकार का परम धर्म है कि खुद आपदा में अवसर की तलाश करे और अपने गोतिया पूँजीपतियों को भी लाभ उठाने दे। जनता तो बेचारी सीधी गाय है, जब मन हो दुह लो। जब तक वह बाज़ार में खड़ी रहे, तब तक मरणासन्न अवस्था तक दुहते रहो। असल में लोकतंत्र पूँजीपतियों और उसके दलालों का शासन है। जनता को सरकार चुनने का भ्रम भले रहे, लेकिन असल लाभ और मजा पूँजीपति और दलाल ही उठाते हैं ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बहुत ही उम्दा अवसर है। वे अपने द्वारा ईजाद तकनीक का भरपूर उपयोग कर नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं। उनके डियर फ्रैंड डोनाल्ड ट्रंप के अंदर नोबेल पुरस्कार के लिए उनकी ख़्वाहिशें हिलोरें मारती रहती हैं। उनके व्यवहारों से लगता है कि इस जन्म में तो उनकी ख्वाहिशें कभी नहीं पूरी होनेवाली, लेकिन नरेंद्र मोदी जी को उनकी समुन्नत तकनीक के लिए नोबेल पुरस्कार मिल सकता है और भारत जैसे महान देश की तात्कालिक समस्या ख़त्म हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया था कि कैसे नाली की गैस से चाय बनाई जा सकती है। उन्होंने विस्तार से उस पर प्रकाश डाला था। उनके जो वैज्ञानिक सांसद हैं, जो गोबर से कोरोना को भगा रहे थे या ख़ुद प्रधानमंत्री ताली पीटकर कोरोना को सात समुद्र दूर भगा रहे थे, सब मिलकर नाली की गैस से कीचन आबाद करने की तकनीक विकसित करें।
भारत में और कुछ की कमी भले हो, नालियों की कोई कमी नहीं है। नालियाँ बहुतायत से उपलब्ध हैं और अगर यह तकनीक सफल हो गई तो दूसरे देशों के लोग भी इस तकनीक को ख़रीदेंगे। वे भारत की नालियाँ उठाकर अपने देश ले जाएँगे और उसका परीक्षण कर नव ज्ञान प्राप्त करेंगे। भारत सरकार को चाहिए कि वह नालियों का सरकारीकरण कर दे। नालियों का ऐसे सदुपयोग नोबेल पुरस्कार देनेवाले का ध्यान ज़रूर खींचेगा और वे हमारे माननीय प्रधानमंत्री को नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत करेंगे। जहाँ ऐसे महान प्रधानमंत्री मौजूद हों, वहाँ क्या मुमकिन नहीं है!
प्रधानमंत्री आपदा में अवसर का लाभ उठायें और भारत को अपने आविष्कार से उपकृत करें। वैसे भी उन्होंने जिस विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की है, वह धरती पर उपलब्ध नहीं है। वे तो वे, उनकी डिग्री तक नॉन बायोलॉजिकल है। प्रधानमंत्री तो धन्यवाद के पात्र हैं ही, धन्यवाद का असली पात्र जनता है, जिसने गोदाम से धो-पोंछ कर ऐसे महान विचारक और नवज्ञान के पुरोधा को भारत का प्रधानमंत्री बनाया है।
व्यापारी को आपदा में अवसर ढूँढने में महारत हासिल है। भारत का सौभाग्य है कि ऐसे पचासों व्यापारी हैं, जो इस अवसर का लाभ उठा रहे हैं। बची जनता, तो इसकी देह पर जबतक चाम है, उधेड़ते रहो, वह देश के लिए क़ुर्बान होती रही है, आगे भी होगी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







May you always find beauty and joy in the simple things of life