जो भी नेता पद पर जाता है तो वह कहता है कि वह जनता के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है। 77 वर्षों में इतने कल्याण नेताओं ने किए कि उनका घर चकाचक है और अस्सी करोड़ जनता पाँच किलो अनाज पर जीने के लिए विवश है। नेताओं से विनम्र आग्रह है कि जनता का कल्याण इतना न करें कि वह दुबलाती जाय और आपकी तोंद फूलती जाए। आपके कल्याण के दुष्परिणाम सामने हैं। जनता चारागाह बन गई है और आप बैल बने बैठे हैं, चरे जा रहे हैं। आप ऐसे चरते जा रहे हैं कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को भी सफ़ाचट करते जा रहे हैं।
चुनाव आयोग लोकतंत्र की रीढ़ है, मगर वह भी रें-रें कर रहा है। आयोग के अध्यक्ष का यह आलम है कि उसे राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के अंतर के बारे में नहीं पता। सरकार भी चाहती है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का अंतर ख़त्म ही न हो, बल्कि राष्ट्रगीत ज़्यादा प्रभुत्वशाली हो और राष्ट्रगान कमज़ोर पड़ जाए। खैर, चुनाव आयोग अध्यक्ष को इससे क्या अंतर पड़ता है कि वे राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की अलग-अलग पहचान न कर सकें। उनकी पीठ पर महामानव का हाथ है और वे महामानव के एजेंडे को लागू कर रहे हैं। जब तक वे पालतू हैं, तब तक उन्हें क्या डर? इसलिए चुनाव को ही रौंदें जा रहे हैं। आश्चर्य यह है कि अब उनकी ड्यूटी वोटर का नाम जोड़ना नहीं, घटाना है। संविधान निर्माताओं ने अद्भुत काम किया था कि सभी भारतीयों को वोटिंग राइट दिया। आप अमीर हों या ग़रीब हों, आम अफ़सर हों या बेरोज़गार हों, आप महिला हों या पुरुष हों- सभी के वोट बराबर हैं। जैसे प्रधानमंत्री कपड़े देखकर नागरिकों की पहचान करते थे, वैसे ही चुनाव आयोग जाति और संप्रदाय देखकर वोट जोड़ने और काटने पर आमादा है। चुनाव का क्रमश: गंदा होते जाना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
चुनाव के ठीक पूर्व और चुनाव के दरम्यान सरकारी ख़ज़ाना लुटाना आम बात है। बिहार में तो आचार संहिता लागू होने के बाद भी दस-दस हज़ार रुपये महिलाओं के खाते में डाले गये और अब असम में नौ-नौ हज़ार डाले जा रहे हैं। चुनाव आयोग को चाहिए कि सरकार पर यह बंदिश लगाए कि चुनाव के छह महीने पूर्व और आचार संहिता के दौरान कोई नयी योजना की घोषणा न करे। इसके पूर्व जिन योजनाओं की घोषणा हुई है, उस पर काम होता रहे।
चुनाव में पैसे का खेल इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि आम जनता चुनाव में खड़ी होने के लिए सोच भी नहीं पाती। नामांकन की फीस, प्रचार के लिए दौरा, बूथ खर्च, चुनाव कार्यालय खर्च, कार्यकर्ताओं के लिए सुविधाएँ जुटाना आदि में इतना खर्च है कि आम जनता का तेल निकल जाता है और फिर वोटरों की भूख मिटाने के लिए भी पैसा चाहिए। लोकतंत्र धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है और इस पर प्रभुत्वशाली वर्ग का क़ब्ज़ा होता जा रहा है। चुनाव सुधार के लिए समिति बनी, रिपोर्ट भी आई, लेकिन उन सिफारिशों को लागू नहीं किया जा सका। चुनाव में रोग लगा और अब यह कैंसर का रूप ले रहा है। इसका ठीक से इलाज नहीं हुआ तो लोकतंत्र को राजतंत्र या सैनिक तंत्र में बदलने में देर नहीं लगेगी। पीर पर्वत सी हो गई है, इसे बदलने की ज़रूरत है । दुष्यंत कुमार ने कभी लिखा था-
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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