इन दिनों : और चाँद चू गया

"चाँद तो सूरज से रोशनी लेता है। आदमी भी एक-दूसरे से ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान ही तो आदमी की रोशनी है, वरना आठ जगहों से टेढ़े अष्टावक्र जनक के दरबारियों को चुनौती कैसे देता!" - इसी आलेख से

दो-तीन दिनों से विचित्र-विचित्र सपने आ रहे हैं, जिनमें एक है चाँद का चू जाना। मैंने देखा कि मैं चाँद के सामने हूँ। चाँदनी फैली हुई है कायनात में कि अचानक चाँद के चेहरे से रोशनी ग़ायब हो गयी और काला पड़ा चाँद गिरने लगा। चारों तरफ़ अँधेरा-ही-अँधेरा। मैं हकबका कर उठा।

आदमी की चेतना के कितने रंग होते हैं! कहा जाता है कि जो इच्छाएँ हम पूरी नहीं कर पाते, वे सपनों में पूरी होती हैं यानी प्यासी इच्छाओं का प्रतिरूप है सपने। लेकिन यह पूरा सच नहीं है । ऐसे सपने भी आते हैं, जिनके ओर-छोर का पता नहीं होता। सपनों के विश्लेषण के बाद संभव है कि उससे संबंधित मनुष्य का मनोविश्लेषण हो, लेकिन बहुत मुश्किल है सपनों का विश्लेषण।

दस-पंद्रह वर्ष पहले भूत के बहुत सपने आते थे। भूत पीछे-पीछे पकड़ने दौड़ता था और मैं हवा में तैरने लगता। आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे भूत। जब तक भूत पास आता, तब तक पसीने से नहाया मेरी नींद खुल जाती। भूत के सपने पूरी तरह ग़ायब हो गए। शायद मन जब तक भूत से डरता था, तब तक वह आता रहा। अब डर ग़ायब हो गया है।

मैंने दादी, पिता, माता और बड़े भाई को दुनिया से विदा होते देखा है, इसलिए कभी-कभी निराशा के वक़्त मौत बहुत डराती थी। पिता की मौत ने अंदर से हिला दिया था। चलते-चलते देह में चिकोटी काट कर देखता कि देह में जान है या नहीं? मगर अब मौत क्या डरायेगी। यहाँ तो मौत का तांडव खेला जा रहा है। बेशऊरे ट्रंप कहता है कि ईरान को पाषाण-युग में पहुँचा देंगे। अमेरिका का चेहरा ख़ून से रंगा है। कितने देशों को तबाह किया। हिरोशिमा और नागासाकी को तो भूत का डेरा ही बना दिया। भूत का सपना क्या आयेगा, जब सत्ता में घुसे तमाम कीड़े भूत बने बैठे हैं।

चाँद तो सूरज से रोशनी लेता है। आदमी भी एक-दूसरे से ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान ही तो आदमी की रोशनी है, वरना आठ जगहों से टेढ़े अष्टावक्र जनक के दरबारियों को चुनौती कैसे देता! ज्ञान-संपदा पर आज कम हमले नहीं हो रहे। जो सत्ता में हैं, वे अज्ञानियों की फौज हैं। वे जनता की कमजोर नसों को सहला कर राजपाट चला रहे हैं। कभी-कभी लगता है कि आकाश का चाँद तो जहाँ-का-तहाँ है, आदमी के अंदर का चाँद चू गया है।

दुनिया नाम लेती है- बुद्ध, गांधी, ईसा और हज़रत मुहम्मद का, लेकिन दुनिया में बर्बरता तारी है। मरने और मारने के संसाधनों पर जितनी संपदा खर्च हो रही है, वह संपदा अगर आदमी की रक्षा में खर्च होता तो कम-से-कम दुनिया बुनियादी सुविधाओं से मरहूम नहीं होती। हर देश दूसरे से डरा है। दबंग देश इसी डर के बूते हथियारों का बिज़नेस कर रहा है। एक महाजाल फैला दिया गया है, जिसमें आम आदमी की गर्दन फँसी हुई है।

सपने तो खैर सपने होते हैं, लेकिन हकीकत जब इतना ख़ौफ़नाक हो जाय तो दुनिया उदास होने लगती है। हमें दुनिया में चमक पैदा करनी है, बुद्धि और विवेक की, समता और न्याय की, सत्य और असत्य में अंतर करने की क्षमता की। बेअदब लोग अगर सीने पर चढ़े रहेंगे तो कभी विवेक की स्थापना नहीं होगी। आदमी में अपूर्व क्षमता है, नाश की और निर्माण की भी। निडरता और विश्लेषण-क्षमता हो तो घनघोर अँधेरे में भी दीपक जलाया ही जा सकता है।

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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