शीशे की खिड़कियों से बाहर देखता हूँ। आसमान साफ़ है और अँधेरा टूट रहा है। माँ ऐसे समय के बारे में कहती थी- फरीछ हो रहा है। फरीछ यानी अँधेरे का छँटना और उजाले का होना। अक्सर अँधेरे के बारे में हमारी राय अच्छी नहीं होती। लेकिन अँधेरा न हो तो उजाले का अहसास कैसे हो? अँधेरा ही है जो इतनी अच्छी सुबह का दिग्दर्शन करवाता है।
चिड़िया की चुनचुन और प्रकृति की उदात्तता। मानव चाहे तो प्रकृति के साथ रह कर नया संसार गढ़ सकता है, लेकिन वह तो दूर, और दूर होता जा रहा है। प्रकृति के खिलाफ ही उसने युद्ध छेड़ रखा है और प्रकृति है कि अपना तेवर दिखा रही है। कभी बेतहाशा गर्मी, कभी सर्दी, कभी असमय बारिश, कभी अकस्मात् बादल का फटना, कभी सुनामी, कभी बीमारी। आप जिसके खिलाफ कुछ करते हैं, वह भी आपके खिलाफ कुछ करता है। कमजोर है तो बुदबुदा कर, मज़बूत है तो लाठी तान कर। बीच की स्थिति नहीं है। जबकि उसकी ही ज़रूरत है।
व्यवहारों में संतुलन, सम्मान, संवाद। लोकतंत्र के लिए यह एकमात्र रास्ता है, मगर फ़िलहाल तो हर बात में विवाद। जनता भी विवादों में रुचि लेती है। माहौल गर्म हो तो विवादों के अपने मजे हैं। संवाद धैर्य, सत्य और कल्याण की चाहत पर आधारित है। वह जीत-हार की परवाह नहीं करता। विवाद और वितंडावाद वह खड़ा करता है, जिसे असत्य बोलना है और जीत हासिल करनी है। जनता के अंदर परसेप्शन पैदा करना है। मनमोहन सिंह भ्रष्ट थे, भ्रष्ट थे- इतने कोने से बोलना है कि जनता मान ले कि मनमोहन सिंह का एक ही काम था- देश को लूटना। बाद में पता चला कि भ्रष्टाचार का कोई मामला सिद्ध नहीं हो सका। ऐसी राजनीति देश को गड्ढे में ही ले जाएगी ।
भारतीय राजनीति में कुहराम मचा है। एक-से-एक नायाब बयान आ रहे हैं। टटका बयान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ सिंह का है। बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान कहा है कि विवेकानंद ने कहा था कि तुम ख़ून दो, मैं आज़ादी दूँगा। आदित्यनाथ सिंह को योगी कहना योगी का अपमान है। इस व्यक्ति ने न योग किया है, न पढ़ा लिखा है। स्वामी विवेकानंद के दो अच्छर ही पढ़ लेता।
ये लोग कहते हैं कि भारत का जो इतिहास लिखा गया है, वह ग़लत है। नया इतिहास लिखना है। प्रधानमंत्री और ऐसे धुरंधर मुख्यमंत्री का ऐतिहासिक बयान को पढ़ लें तो जान जायेंगे कि ये कैसा इतिहास लिखना चाहते हैं। ऐसे व्यक्ति का ज्ञान दोयम दर्जे का होता है, लेकिन आपने पद दे दिया है। ये किसी भी चीज़ पर बोकरेंगे। जनता को लगता है कि इतने बड़े पद पर बैठा व्यक्ति झूठ तो नहीं ही बोलेगा। नतीजा है कि झूठ भी अपना मुकम्मल इतिहास गढ़ने लगता है।
रील और सोशल मीडिया को देखिए। अस्सी-नब्बे फ़ीसदी झूठ ही भरा रहता है। युवा और जनता इससे ही प्रशिक्षित हो रहे हैं। व्हाट्सएप ग्रुप में झूठ पर ही एक दूसरे पर तलवार तान रहे हैं। शिव के तांडव से कुछ लोग आतंकित हुए होंगे, लेकिन झूठ के तांडव से यहाँ तो फिजां ही बेचैन है। ऐसी गदहपचीसी खेली गयी है कि गदहे तो जहाँ थे, वहीं हैं, मनुष्य में एक नयी प्रजाति पैदा हो रही है।
महर्षि अरविंद ने मनुष्य का अगला चरण अतिमानव का माना था, लेकिन यहाँ तो बात उलट गई है। उसने तो अपनी लघुता को ही प्रभुता मान लिया है। सिर्फ़ माना नहीं है, वह गर्वोगुमान से भरा है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







