मैं खुद ‘सैंतालीस के गांधी’ नामक शीर्षक से एक पुस्तक लिखना चाहता था कि पुष्यमित्र की पुस्तक आ गयी- ‘गांधी का सैंतालीस’। जिन्हें गांधी से बहुत शिकवे- शिकायत हैं, वे केवल इस पुस्तक को पढ़ लें। मैं गांधी को पढ़ता रहा हूँ। उन पर लिखी किताबों की ख़रीदारी करता रहा हूँ। पुष्यमित्र की किताब भी ख़रीद ली और पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब- ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी‘।
मन में सवाल आता है कि महात्मा गांधी से वामपंथी, दक्षिणपंथी और यहाँ तक कि अम्बेडकरवादी भी इतने असहज क्यों हैं? क्या महात्मा गांधी ने तीनों के खिलाफ काम किया? उनके जीवन और उनके प्रयोगों से वे इतने आहत क्यों हैं? दक्षिणपंथियों की बात तो समझ में आती है। मनुस्मृति के पोषक लोग गांधी को बर्दाश्त नहीं कर सकते, क्योंकि गांधी वर्णाश्रम की स्वीकृति से चले और अंतर्जातीय विवाह तक आये। वे अस्पृश्यता के जीवन भर खिलाफ रहे। वे भंगी नहीं थे, लेकिन भंगियों के साथ रहने में उन्हें कोई गुरेज़ नहीं था। यहाँ तक कि अपने आश्रमों में जो भी नये कार्यकर्ता आते, उनको पहला काम पाख़ाना साफ़ करने का होता। नोआखाली के भीषणतम दंगों को शांत कराने जब गांधी घूमते तो उनके रास्ते पर पाख़ाने फेंक दिए जाते और गांधी उसे साफ़ करने में लग जाते। अपने आश्रम में अछूत की बेटी लक्ष्मी को बेटी बना कर पाला और उसकी शादी एक ब्राह्मण से की। अपने बेटे की शादी भी अंतर्जातीय की।
मैं डॉ भीमराव अम्बेडकर की पिछली जयंती 14 अप्रैल 2026 के अवसर पर अम्बा नामक गाँव गया था। यह भागलपुर के एक प्रखंड शाहकुंड में स्थित है। अम्बेडकर जयंती के अवसर पर उनकी एक प्रतिमा का अनावरण होना था और उनके नाम पर एक पुस्तकालय का भी। यह कार्यक्रम मेरे एक प्रिय छात्र नागेश्वर ने किया था। वह अब एक विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर है। मैंने उसे बी.ए, और एम.ए में पढ़ाया तो है ही, मेरे निर्देशन में उसने पीएच-डी उपाधि हेतु थीसिस भी जमा कर रखी है। मैं नहीं जानता था कि वह दलित-समूह से है। उसकी शादी में पिछले वर्ष गया था तो समझ में आया। मैंने आज तक किसी छात्र या छात्रा की जाति न कभी पूछी, न जानने का प्रयास किया। वहाँ एक सभा थी।
डॉ भीमराव अम्बेडकर की जयंती पर सभा हो और गांधी का ज़िक्र न हो, यह असंभव है। पूना पैक्ट के संदर्भ में गांधी पर कटाक्ष करना तो स्वभाव में शामिल हो गया है। 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड ने कम्युनल अवार्ड के तहत दलितों को पृथक् निर्वाचन का अधिकार दिया। दलितों के लिए 71 सीट आरक्षित भी हुई। यानी देश भर के आरक्षित 71 सीटों पर सिर्फ़ दलित ही अपने समूहों के उम्मीदवारों के लिए वोट करते। ऐसे ही अधिकतर मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि ग्यारह अल्पसंख्यक समूहों को दिया गया था। आज़ादी के बाद इन समूहों के भी पृथक निर्वाचन के अधिकार ख़त्म किए गए। दलितों को भी अंग्रेज़ी सत्ता ने अल्पसंख्यक घोषित किया और उन्हें भी पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया। महात्मा गांधी आरक्षण के ख़िलाफ़ नहीं थे। उन्हें लगा कि इससे हिन्दू समाज की एकता खंडित होगी, इसलिए आमरण अनशन पर बैठ गए। अम्बेडकर और गांधी में जो पूना पैक्ट हुआ, उसमें पृथक निर्वाचन के अधिकार को ख़त्म किया गया और दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 71 से 148 की गई। आज़ादी के बाद सभी अल्पसंख्यक समूहों के पृथक निर्वाचन के अधिकार को ख़त्म किया गया। यह सब संविधान ड्राफ्टिंग समिति के अध्यक्ष डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व में हुआ।
राष्ट्र की एकता के लिए यह ज़रूरी कदम था। कल्पना कीजिए कि दलितों के लिए पृथक निर्वाचन का अधिकार क़ायम रहता तो क्या होता? क्या वह पार्टीबंदी से अलग रहता? मात्र अपने वोट से जीतने वाले दलित उम्मीदवार सचमुच में पार्टी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर दलितों के लिए अलग से सवाल उठा पाते? उनका हश्र भी क्या वही नहीं होता, जो आज के दलित प्रतिनिधि का हो रहा है? यह क़तई नहीं भूलना चाहिए कि पूना पैक्ट के बाद डॉ भीमराव अम्बेडकर खुश थे कि उनकी आरक्षित सीट 71 से 148 हो गई। उन्होंने अपनी ख़ुशी के इज़हार के लिए बबंई में एक सभा भी की थी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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