नैतिकता क्या है और वर्जनाएँ क्या हैं? क्या नैतिकता कोई स्थायी चीज़ है, जो हर काल में अपना रूप बनाए रखती है या वह समय के साथ बदलती रहती है? आज ज़्यादातर लोग चिंतित हैं कि लोगों की नैतिकता मर रही है। पर सवाल है कि नैतिक क्या है और अनैतिक क्या है?
सामान्य रूप से मान सकते हैं कि जीवन के जो पक्ष में है, वह नैतिक है और जीवन के जो खिलाफ है, वह अनैतिक है। नैतिकता के दो रूप संभव हैं। एक – व्यक्तिगत स्तर पर और दूसरे सामाजिक स्तर पर। एक व्यक्ति की अपनी ज़रूरत होती है- शरीर के स्तर पर और मन के स्तर पर। व्यक्ति के जो संबंध बनते-बिगड़ते हैं- इन पर विचार नैतिकता के आधार पर किया जाता है। पहले खुलापन कम था और व्यक्तित्व की तलाश भी नहीं थी तो अंदर-ही-अंदर घुटन थी और सड़ांध भी। व्यक्ति स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं हो पाता था। रोक-टोक भी बहुत थी। अब किसी पर कोई रोक-टोक नहीं है यानी कोई किसी को बरज नहीं रहा। बल्कि लोग एक दूसरे से परहेज करते हैं। बड़ों को बच्चों से डर रहता है कि कोई मुँह पर जवाब न दे दे। पहले टोले-मुहल्ले के लोग भी टोक देते थे। अब घर वाले भी टोक नहीं पा रहे। समाज ने कुछ क्रियाओं को वर्जित कर रखा था। वर्जनाओं का वह घेरा टूट रहा है।
वर्जनाओं के टूटन से संबंधों हाहाकार मचा हुआ है। परिवार और घर पर खतरा मँडरा रहा है। दरअसल संसार वह है जो ससर रहा है यानी बदल रहा है। इस बदलाव के झोंके में नैतिकता और वर्जनाओं के दायरे भी बदल रहे हैं। इस बदलाव के दो संकट हैं- एक, मन इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाता और दूसरे- इस बदलाव की अपनी कमज़ोरियाँ हैं। बदलाव ज़रूरी है, लेकिन सत्य, करूणा और विवेक पर आश्रित हो। गाँव-घरों में पुराने काल को देखें तो उसमें कमज़ोर वर्ग के टोलों पर हर तरह के जुल्म होते थे। स्त्रियों का दुरूपयोग होता था। जो मज़बूत थे, वे ख़ुद को महाबली मानते थे। जो महाबली मान रहे थे, वे भी अनैतिक थे और जिन पर जुल्म होता था, उनकी मजबूरी और सहनशीलता भी अनैतिक थी।
एक समय आया कि दोनों का आमना-सामना होने लगा। पुरानी स्थितियाँ बदलने लगीं। जो भी संबंध थे, वे खंडित होने लगे। गाँव के बच्चे शहर आये। शहर की आदतें गाँव गयीं। मैंने दो वर्ष मुंगेर में पढ़ाई की है। वहाँ वैश्याओं का एक नामी मुहल्ला था- श्रवण बाज़ार। जिस शहर में आधा से ज़्यादा जीवन गुज़ारा। उस शहर में भी वैश्या का एक मुहल्ला था- जोगसर। अब ये दोनों मुहल्ले नहीं हैं। स्थिति बदली है। स्त्रियों में भी नयी चेतना आई है। यह नयी चेतना कभी-कभी विद्रूप रूप में प्रकट होती हैं। समता आधारित संबंध बनने चाहिए। साथ ही करूणावान भी। पुरुष सत्ता का दबाव हज़ारों वर्षों से है। जब इसकी खिलाफत होगी तो इसके टेढ़े-मेढ़े रूप भी प्रकट होंगे।
टेढ़े-मेढ़े रास्ते ज़्यादा विद्रूप न हों, इसके लिए एक सुगठित सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत है। सामाजिक संबंधों और राजनीतिक संबंधों में जो उछल-कूद है, वह भयानक और असहनीय है। राजनीति का अर्थ राज की नीति नहीं, राज की अनीति हो जाय तो सामान्य जीवन ख़तरनाक दौर में चला जाता है। देश के हुक्मरानों को पता नहीं है कि उसके कुकृत्य, झूठ और अनैतिक आचरण का कितना दुष्प्रभाव समाज के संबंधों पर पड़ रहा है। आज का दौर संक्रमण का दौर है। पुरानी चीज़ें रहीं नहीं और नयी का स्वरूप विकसित हो नहीं पा रहा, जहाँ मनुष्य मनुष्य की तरह जी सके।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







