सिर्फ़ सप्ताह-भर की बात है। सात दिन पूर्व पीपल में एक भी पत्ता नहीं था और आज हर डाली में भर-भर के पत्ते हैं। हवा थोड़ी-सी भी सिहकती है, उनके गान शुरू हो जाते हैं। ग्यारह महीने तक वे डालियों पर राज करते हैं।
पीपल के कई नाम हैं- अश्वत्थ, बोधिवृक्ष, चैत्य वृक्ष, क्षीरद्रुम, महाद्रुम। अश्वत्थ संस्कृत नाम है जिसका अर्थ होता है – घोड़े के ठहरने का स्थान। राजाओं की भिड़न्त में पीपल घोड़े के लिए कभी पनाहगाह बना हो, इसलिए शायद इसका नाम पड़ा अश्वत्थ। बोधिवृक्ष का अपना ऐतिहासिक संदर्भ है। उरुवेला (मौजूदा बोधगया) में बुद्ध को पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई, इसलिए इसका नाम पड़ा बोधिवृक्ष। कहाँ घोड़े के ठहरने का स्थान और कहाँ बोधिवृक्ष।
कर्म में ताप बहुत होता है। राजा मारकाट में घोड़े को सुस्ताने के लिए पीपल की छाया का उपयोग करते थे और जब पीपल की छाया के तले बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया तो घोड़े के ठहरने का स्थान बोध प्राप्ति का स्थान हो गया। इसके बाद तो पीपल के वृक्ष का जैसे भाग्य जाग गया हो। इसके नाम में चमक पैदा हो गई। नाम पड़ा- चैत्य वृक्ष और महाद्रुम। ये नाम तो लोगों के कर्मों के फल की वजह से हैं। पीपल के अपने स्वभावगत नाम भी हैं- चलाचल और क्षीरद्रुम। चलाचल इसलिए कि उसके पत्ते चलते रहते हैं और क्षीरद्रुम इसलिए क्योंकि इसकी छाल से निकलते हैं क्षीर यानी दूध। पीपल एक लोकबद्ध वृक्ष है- जन-जीवन से आबद्ध। धार्मिक उत्सव में पीपल की याद आती है। मैं जब गाँव में था और गाय चराने जाता था तो इसी पीपल के तले पनाह लेता था। तब मैं पीपल को पीपर कहता था।
पीपर के नीचे हँसी- मजाक और कभी बोगिलबाजी। हम बच्चे बोगिल (धरती पर चौकोर खींचीं रेखाएँ) बनाकर गुल्लियाँ टनकारते। अब गाँव से गुल्ली और गाय दोनों ग़ायब हो गए हैं। गाँव हैं, लेकिन अब बच्चे गुल्लियों से परहेज करते हैं और अपना बचपन उन्होंने मोबाइल की अंधी दुनिया को समर्पित कर दिया है। मोबाइल की स्क्रीन पर इतने और ऐसे-ऐसे लुभावने दृश्य आते हैं कि बच्चों का बचपना लुप्त हो गया है।
और बेचारी गायों को पता नहीं है कि राजनीति में उसकी कितनी महत्ता है। जिसने गाय को कभी सानी-पानी नहीं दिया, उन्होंने गौरक्षा का ठेका ले लिया है। गोबर और गौमूत्र के तो जलवे हैं। टेलिविज़न पर पार्टियों के प्रवक्ता और साधु-संत आपस में ऐसे भिड़ते हैं कि लगता है कि गाय सचमुच उनकी माँ है।
यंत्र के युग में ढोंग सिर पर चढ़ कर बोल रहा है। कबीर ने कभी ढोंगी साधु के बारे कहा था- मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा। अब कबीर नहीं हैं। ढोंग के मामले में साधु भी पिछड़ गए हैं। नेताओं ने उनको उस गद्दी से अपदस्थ कर दिया है। जिनके असत्य भाषण से कान पक रहे हों, वे भी चंदन-टीका से सजधज कर वोट माँग रहे हैं। ये लोग ध्यान-साधना नहीं करते, बल्कि गद्दी-साधना करते हैं।
इन्होंने ईश्वर तक को कन्फ्यूज्ड कर दिया है। ईश्वर को कुछ समझ में नहीं आ रहा कि वे क्या करें? वे उल्टे-सीधे वरदान दे रहे हैं। सुबह उनको लगता है कि अमुक वरदान के योग्य हैं, वे भोले हैं, दे डालते हैं। शाम को उसे देखते हैं तो वे माथा पकड़ कर बैठ जाते हैं और अफ़सोस करते हैं कि यह क्या कर डाला? एक बार भस्मासुर को वरदान देकर उन्हें पछतावा हुआ था, लेकिन यहाँ तो भस्मासुर की लाइन लगी है। बहुरंगे मानव के चाल, चरित्र और चेहरा देखकर वे भौंचक हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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