राँची में हूँ और वह भी काँके के इलाक़े में। गाँव में था तो काँके का नाम सुनता था। जब कोई अतिरिक्त बड़बड़ाता या लंबी फेंकता था तो उसे लोग कहते थे- काँके जाना है क्या? मेरे पड़ोस में एक व्यक्ति था, जो सचमुच काँके रिटर्न था। ज़िंदगी भी कैसे-कैसे मोड़ लेती है! वह व्यक्ति एयरफ़ोर्स में काम करता था। अचानक एक दिन उसका दिमाग़ चढ़ गया और उसने अपनी बंदूक़ से कई फ़ायरिंग कर दी। उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। मैंने रस्सियों से बँधा देखा है। उसे काँके लाया गया। उसे दवा दी गई। फिर उन्होंने पूरी ज़िंदगी मस्ती में गुज़ारी। गर्मी के दिनों में वे ताश बहुत खेलते। मैंने भी उनके साथ ताश की पत्तियाँ फेंटी हैं। हवा का एक झोंका आया और उनके जीवन को बदल दिया। क्या देश की फ़िज़ाओं में भी नयी हवा का झोंका आने वाला है?
मैं पतरातू रोड पर हर सुबह टहलने जाता हूँ। लंबी-चौड़ी सड़कें हैं। गाड़ियों की रफ़्तार बहुत रहती है। यों सुबह बहुत कम गाड़ियाँ चलती हैं, पर एक दृश्य मुझे हर दिन आकर्षित करता है। एक मोटरसाइकिल के पीछे क्रम से चार से लेकर आठ तक साइकिलें रस्सियों के सहारे जुड़ी रहती हैं। उन साइकिलों की दोनों तरफ कोयले लदे रहते हैं। कोयले भी एकाध बोरे नहीं, बल्कि कम-से-कम आठ बोरे। चार एक तरफ और फिर दूसरी तरफ चार। साइकिल सवार सिर्फ़ हैंडिल सँभाले रहता है। यह कोई कृत्रिम मेधा का कमाल नहीं है। यह अनुभव सिद्ध लोक बुद्धि है। इसे कह सकते हैं जुगाड़ बुद्धि। देश में बदलाव की जो हवा बहेगी, उसमें जुगाड़ बुद्धि बचेगी या दूसरा रूप लेगी।
मुश्किल यह है कि सत्ता बदलती है, लेकिन तरीक़े कमोबेश वही रहते हैं। नतीजा यह होता है कि आगे चलकर पूर्व की सरकारों से भी बदतर करते नजर आते हैं। हर बार व्यवस्था बदलने की बात होती है, लेकिन सत्ता बदल तक बात रह जाती है। एक बार फिर फ़िज़ाओं में बदलाव की गंध है। वह किस रूप में व्यक्त होगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन लोगों को अपनी राय स्पष्ट रूप से रख देनी चाहिए।
मौजूदा व्यवस्था में मनुष्य विरोधी जो प्रवृत्तियाँ हैं, उन्हें चिह्नित कर बता देना ज़रूरी है। हम अंधी हवाओं के साथ नहीं चलें। हमें अब सचेत हवा की जरूरत है। बदलाव होता है तो नौकरशाही कैसी होगी, आर्थिक व्यवस्था कैसी होगी, चुनाव प्रक्रिया कैसे संचालित होगी, राजनीतिक सत्ता में कैसा बदलाव होगा, शिक्षा का क्या होगा, धर्म और संस्कृति का स्वरूप क्या होगा? इन सब पर हमारे विचार स्पष्ट हों। लोकतंत्र में सचमुच लोक की आकांक्षाएँ पल्लवित-पुष्पित हों, इसकी ठोस व्यवस्था करनी होगी।
पढ़े-लिखे लोग भी बहुधा साज़िश और स्वार्थ के शिकार हो जाते हैं। रामचंद्र गुहा एक बड़ा नाम है। उसकी समस्या सत्ता नहीं, विपक्ष है। वह विपक्ष को ही नकारा साबित कर रहे हैं। अप्रत्यक्ष रूप से यह कह रहे हैं कि विपक्ष से कोई उम्मीद नहीं है। रामचंद्र गुहा कितने ही बौद्धिक कौशल का परिचय दें, विपक्ष को नकारा साबित कर दें, लेकिन सच्चाई यह है कि वर्तमान सरकार दोयम दर्जे की सरकार है जो सिर्फ़ झूठे प्रचारों और लफ़्फ़ाज़ियों पर टिकी है। उसकी समझ कौडी भर की भी नहीं है। वह हिन्दुओं की कमज़ोर भावनाओं से खेल रही है। इसके दुष्परिणाम आने लगे हैं। आर्थिक हालत ख़ास्ता है। बेरोज़गारी और महँगाई नंगा नाच कर रही है। कॉरपोरेट जगत को खुश करने के लिए ग़रीबों पर हमले जारी हैं। नेताओं के चेहरे से घृणा टपकती है। यही कारण है कि हवा का नये झोंके का अहसास हो रहा है।
नये झोंके की वजह तो साफ है, लेकिन उनके मुद्दे भी स्पष्ट होने चाहिए।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








संवैधानिक संस्थाओं को तटस्थ मानकर प्रो. रामचंद्र गुहा का निष्कर्ष गलत अवधारणा का शिकार है।