इन दिनों : युवाओं का प्रदर्शन: साज़िश, संदेह और उम्मीदें

"ये लोग हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, देशद्रोही जैसे शब्दों से शुरू होते हैं और वहीं ख़त्म।" - इसी आलेख से

कल कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध-प्रदर्शन जंतर-मंतर पर हुआ। मुख्य माँग थी- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा। युवा आये। भीड़ अच्छी-ख़ासी थी। वामपंथ की तीनों पार्टियों के युवा भी शामिल थे। भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य तो वहाँ साक्षात् मौजूद थे। लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी थे। युवाओं के हाथों में डॉ अम्बेडकर और भगत सिंह की तस्वीरें थीं। कुछ लोग कहते हैं कि गांधी की भी तस्वीरें थीं, लेकिन मैंने सोशल मीडिया पर जितनी तस्वीरें देखीं, उनमें गांधी नहीं थे।

कॉकरोच पार्टी के अभिजीत दीपके दलित हैं। यह तथ्य सोशल मीडिया पर जब उजागर हुआ तो मैंने लक्ष्य किया कि बहुजन सामाजिक कार्यकर्ता उनकी ओर झुकते नजर आए। गर्मी, उमस और भीड़ के कारण अभिजीत दीपके की तबियत ख़राब हो गई।

प्रर्दशन के पक्ष-विपक्ष में बहसें चल रही हैं। जीवित समाज का यह लक्षण है कि वह बहस करे। मजा यह था कि जिस आरएसएस और बीजेपी के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसने ही यह खेला किया है, उसके कार्यकर्ता प्रदर्शनकारियों से भिड़ते नजर आए। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर आरोप लगाया कि ये लोग भारत, भारत माता और आरएसएस के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। वे यह भी कहते नजर आए कि कॉकरोच जनता पार्टी को मसल देंगे। आरएसएस के कार्यकर्ता बहुत चतुर- चालाक होते हैं, वे प्रदर्शन करनेवालों पर कोई भी आरोप लगा सकते हैं और आरोप की सत्यता के लिए देश विरोधी नारे भी लगा और लगवा सकते हैं। वैसे मैंने प्रदर्शनकारियों द्वारा भारत के विरोध में लगाए गए कोई नारे नहीं सुने।

कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर कुछ लोगों को आशंकाएँ हैं। इनके पीछे उन्हें साज़िश की बू आती है। इसकी एक बड़ी वजह यह बताते हैं कि जिस दिल्ली में किसानों को घुसने नहीं दिया, इसी जंतर मंतर पर महिला पहलवानों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। तमिलनाडु के किसानों ने जब नग्न प्रदर्शन किया तो उस पर हमले हुए। उसी जंतर मंतर पर इतनी आसानी से कॉकरोच जनता पार्टी को प्रदर्शन करने की इजाज़त कैसे दे दी गई? दूसरी बात यह कह रहे हैं कि सत्ता शातिराना तरीक़े से युवाओं के असंतोष को थोड़ी जगह देकर उसे फुस्स कर रही है। तीसरे बात यह कह रहे हैं कि ये मध्य वर्ग के युवा हैं। कोमल स्वभाव के हैं। इन्होंने समाज में और ज़मीन पर कोई संघर्ष नहीं किया है। रातोंरात सोशल मीडिया पर आंदोलन का बिगुल फूँकने से व्यवस्था परिवर्तन संभव नहीं है। डॉ भीमराव अम्बेडकर की तस्वीर लेकर घूमना और उन्हें आत्मसात् करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। वे आंदोलन के कड़े संघर्ष की राह में टिक नहीं पायेंगे। मैंने सोशल मीडिया पर देखा कि ये सधे हुए प्रशिक्षित नारे लगा रहे हैं। दूसरी बात यह थी कि वे साफ-साफ कह रहे थे कि पिछले बारह वर्षों में हिन्दू-मुसलमान के सिवा कुछ नहीं हुआ है। ये लोग हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, देशद्रोही जैसे शब्दों से शुरू होते हैं और वहीं ख़त्म। तीसरी बात रेखांकित करने की यह है कि वे ढोकर नहीं लाये गये थे और 40 डिग्री की गर्मी में भी खड़े रहे।

अन्ना आंदोलन के दौरान कांग्रेस की सरकार थी। आरएसएस और बीजेपी ने इसका भरपूर इस्तेमाल किया। क्या वह देश में कांग्रेस की पुनर्वापसी की आशंकाओं से परेशान होकर ऐसा किया है? या उसके हाथ में युवाओं का कमान नहीं है ? यह भी रेखांकित करने योग्य बात है कि मौजूदा परिस्थिति में बीजेपी सरकार में है और क्या ऐसी दशा में वह खुद से कोई भस्मासुर पैदा करेगी?

मुझे लगता है कि अगर कॉकरोच जनता पार्टी बीजेपी सरकार को उखाड़ने के लिए कमर कसती है तो उसका साथ देना चाहिए। हाँ, यह कोशिश करते रहनी चाहिए कि आंदोलन अराजक न हो और विचारधारा से लैस हो। व्यवस्था में जो गड़बड़ी आ गई है, उसे भी रेखांकित करते रहना चाहिए और युवाओं के स्वर को बुलंद करनी चाहिए ।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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lokjivan
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